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सीरिया के संकट ने विश्व परिदृश्य को प्रभावित किया है

SYRIA-CRISIS/सीरिया का संकट एक बड़े युद्ध के मुहाने से, वार्ता की ओर मुड़ रहा है। लम्बे तनाव के बाद शांति वार्ता के मुददे पर रूस और हमले के लिये पगलाये हुए अमेरिका के बीच बनी न्यूनतम सहमति से युद्ध के खतरे को टाला जा सका है। विश्व जनमत, विश्व समुदाय और सीरिया की बशर-अल-असद सरकार को थोड़ी सी राहत मिल गयी है, इसके बाद भी हम यह नहीं कह सकते हैं, कि क्षेत्रीय तनाव घट गया है, क्योंकि सामरिक घेराबंदी और सीरिया में संघर्ष जारी है। हो रहे बदलाव को, अब रोका नहीं जा सकता। अमेरिका कूटनीतिक पराजय के करीब है, और रूस के नेतृत्व में एक नये ध्रुवीकरण की संभावनायें बन गयी हैं, जो युद्ध को नियंत्रित कर सकती है। जिस वार्सा संधि के टूटने से शीतयुद्ध की समापित हुर्इ थी, उस शीतयुद्ध की वापसी हो गयी है। अमेरिकी नेतृत्व में ‘नाटो सैन्य संगठन’ के देशों ने इसे अनिवार्य बना दिया। ‘राजनीतिक अस्थिरता और सैन्य हस्तक्षेप की नीतियों’ ने उन स्थितियों की रचना की, जिनकी वजह से शक्ति संतुलन की अनिवार्यतायें बढ़ती चली गयीं। यह ठीक है, कि आज सोवियत संघ और पूर्वी यूरोप के समाजवादी देश नहीं हैं, जिन्होंने सात दशक से भी लम्बे समय तक विश्व की शांति और स्थिरता को बनाये रखा, यूरो-अमेरिकी वर्चस्व को नियंत्रित रखा, जिनके होने से इराक, अफगानिस्तान और लीबिया जैसी वारदातें नहीं होतीं, और सीरिया का संकट युद्ध के मुहाने तक नहीं पहुंच पाता। आज भी सीरिया के प्रायोजित संकट को युद्ध के मुहाने से वार्ताओं की मेज तक लाने में पूर्व सोवियत संध का सदस्य देश रूस और पूर्व समाजवादी देश चीन की भूमिका बड़ी है। पूर्वी यूरोप के पूर्व वार्सा संधित के देशों ने भी सीरिया पर अमेरिकी हमले का विरोध किया। बशर-अल-असद सरकार के द्वारा रासायनिक हथियारों के उपयोग को हमले का तात्कालिक कारण बनाने की अमेरिकी साजिशों के पक्ष में अमेरिका के मित्र देशों का भी समर्थन उसे पूरी तरह नहीं मिला। अमेरिका की आम जनता ने भी बराक ओबामा को गलत करार दिया, जिसे रूस ने सबसे पहले ‘बकवास’ करार दिया था। सीरिया के जरिये मध्य-पूर्व पर, और मध्य-पूर्व को आधार बना कर एशिया पर अपने वर्चस्व को कायम करने की अमेरिकी नीतियां सीरिया में दूर्घटनाग्रस्त हो गयी हैं। आम अमेरिकी अपने देश के प्रति गहरी निराशा में है। ‘ब्लूमबर्ग नेशनल पोल’ के अनुसार ”68 प्रतिशत अमेरिकी का मानना है कि अमेरिका की दिशा गलत है। उनका देश गलत नीतियों से संचालित हो रहा है। मात्र 25 प्रतिशत लोग ही ऐसे हैं, जो मानते हैं कि अमेरिका की नीतियां और दिशा सही हैं।” सर्वे से इस बात के स्पष्ट संकेत मिलते हैं कि डेमोक्रेटिक राष्ट्रपति बराक ओबामा ही नहीं, रिपबिलकन पार्टी की शाख भी गिरी है। सीरिया के प्रति बराक ओबामा के हमले की नीति का 53 प्रतिशत लोगों ने विरोध किया है। हाल ही में न्यूयार्क टार्इम्स और सी बी एस न्यूज द्वारा कराये गये सर्वे के अनुसार लगभग 50 प्रतिशत अमेरिकियों ने बराक ओबामा के सीरिया और र्इरान के प्रति नीतियों का विरोध किया है। सीरिया के मुददे ने घरेलू और वैश्विक स्तर पर अमेरिकी नीतियों की बखिया उधेड़ दी है। जहां उसके पास अपने सही होने का ठोस तर्क नहीं है। इसके बाद भी ओबामा सीरिया के विरूद्ध लगातार बोल रहे हैं। उनकी कोशिश शांतिवार्ता के साथ सख्त कार्यवाही के विकल्प को बनाये रखना है। खबरें बांटी जा रही हैं, कि रूस और अमेरिका के बीच इस बाबत सहमति बन गयी है। मानी हुर्इ बात है, कि यह सममति सीरिया पर ‘नाटो हमले’ के विकल्प के रूप में नहीं होगी। इसके बाद भी पश्चिमी मीडिया और अमेरिकी लाबी इसका प्रचार कर रही है, वास्तव में अमेरिकी सरकार, मध्य-पूर्व एशिया में सीरिया के मुददे को लेकर अपनी सामरिक उपस्थिति बनाये रखना चाहती है। उस क्षेत्रीय तनाव को बनाये रखना चाहती है, जिसकी वजह से हथियारों की होड़ के साथ असुरक्षा की भावना बढ़ती रहे। इसी असुरक्षा की बुनियाद पर वह युद्ध और हमले के लिये अरब देशों से मोल-भाव कर सकती है। उन आतंकी गुटों को पाल सकती है, जो राजनीतिक अस्थिरता पैदा करने के कारगर हथियार रहे हैं। ओबामा सरकार अपने लिये इन अनिवार्यताओं को बचा कर रखना चाहती है, क्योंकि अपने वर्चस्व और अपने विरूद्ध बढ़ते जनअसंतोष को संभालने का, और अपनी वित्तीय चुनौतियों को हल करने का उसके पास कोर्इ और जरिया नहीं है। सीरिया के संकट ने विश्व परिदृश्य को प्रभावित किया है। 13 सितम्बर को ‘शंघार्इ सहयोग संगठन’ का सम्मेलन किरगिस्तान की राजधानी बिश्केक में हुआ। जिसमें वैश्विक तनाव और अमेरिका के द्वारा सीरिया पर हमले का मुददा छाया रहा। रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने जोर दे कर कहा कि ”राष्ट्रसंघ के सुरक्षा परिषद की अनुमति के बिना कोर्इ भी बाहरी हंस्तक्षेप हमें स्वीकार नहीं है।” सम्मेलन के संयुक्त घोषणा पत्र में भी सीरिया मे पश्चिमी हस्तक्षेप का विरोध किया गया साथ ही मध्य-पूर्व में आतंरिक एवं क्षेत्रीय संतुलन में आयी कमी का विरोध किया गया। घोषणा पत्र में अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन के तहत सीरिया की सरकार और सीरिया के विपक्षी ताकतों के बीच वार्ता कराने की बात की गयी। मास्को जी-20 सम्मेलन से पूर्व ‘बि्रक्स देशों’ की बैठक और उसके बाद शंघार्इ सहयोग संगठन के देशों की एकजुटता, तथा जी-20 सम्मेलन में भी बराक ओबामा का अलग-थलग पड़ जाना, एकसाथ घटी ऐसी राजनीतिक स्थितियां हैं, जिसका प्रभाव वैश्विक स्तर पर पड़ा, और सीरिया पर हमले की अमेरिकी योजना को गहरी मात मिली। र्इरान के नये राष्ट्रपति हसन रोहानी ने भी रूस के इस प्रस्ताव का समर्थन किया, जिसके तहत सीरिया अपने सारे रासायनिक हथियार अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को सौंप देगा। उन्होंने कहा- ”इससे इस बात की संभावना बनती है, कि इस क्षेत्र में एक नये युद्ध को टाला जा सकता है।” रोहानी पूर्व राष्ट्रपति अहमदीनेजाद के अपेक्षा कम अमेरिका विरोधी माने जाते हैं। शंघार्इ सहयोग संगठन ने र्इरान के परमाणु कार्यक्रम को अपना समर्थन दिया। अमेरिका या उसके सहयोगी देशों का नाम लिये बिना एक स्वतंत्र राष्ट्र के खिलाफ हस्तक्षेप एवं युद्ध के खतरों को बढ़ाने का विरोध किय गया और चेतावनी दी गयी। शंघार्इ सहयोग संगठन ने अपने संयुक्त घोषणा पत्र में वाशिंगटन के द्वारा पूर्वी यूरोप और एशिया में ‘ऐंटी बैलेसिटक मिसाइल डिफेन्स सिस्टम’ लगाने का भी विरोध किया। कहा गया कि ”अपनी सुरक्षा के लिये दूसरों की सुरक्षा खतरे में डालना गलत है।” युद्ध के खिलाफ, समान हितों से संचालित होने वाले रूस और चीन की सम्बद्धता, सीरिया और र्इरान ही नहीं किसी भी देश के आंतरिक मामले में हस्तक्षेप के विरूद्ध है, यही कारण है कि तीसरी दुनिया के देशों में उनकी विश्वस्नियता बढ़ी है, उसी अनुपात में अमेरिका एवं पश्चिमी देशों का यकीन घटा है। दुनिया के ऐसे छोटे देश जो अमेरिकी असुरक्षा के शिकार थे, जिन्हें लीबिया के पतन और कर्नल गददाफी के अंजाम ने डरा दिया, उन छोटे देशों के लिये मौजूदा सीरिया की समस्या का समाधान के लिये, युद्ध के खिलाफ रूस, चीन और अन्य सहयोगी देशों और संगठनों का खड़ा होना, बनता हुआ सही विकल्प लग रहा है। उनकी सम्बद्धता बढ़ती जा रही है। हालांकि रूस और चीन की अहस्तक्षेप की नीतियाें का चेहरा पूरी तरह साफ नहीं है। यह साफ नहीं है कि मुक्तबाजार के नये क्षेत्र की रचना का स्वरूप क्या है? दस साल पहले जब अमेरिका ने इराक पर हमला किया था, उस वक्त पूर्वी यूरोप के सभी पूर्व समाजवादी देशों ने, उसे अपना समर्थन दिया था। मगर आज सभी पूर्वी यूरोप के देशों ने सीरिया पर अमेरिकी हमले के प्रस्ताव को खारिज कर दिया। पोलैण्ड के विदेश मंत्री के अनुसार- ”जान कैरी ने फोन पर सीरिया के खिलाफ सैन्य कार्यवाही में सहयोग देने का प्रस्ताव रखा था। जिसे पोलैण्ड के प्रधानमंत्री डोनाल्ड तुस्क ने अस्वीकार करते हुए कहा कि ”उनकी सरकार इस बात से सहमत नहीं है, कि युद्ध से अपराध को रोका जा सकता है।” चेक गणराज्य ने भी अमेरिकी हमले से किनारा कर लिया कि ”सीरिया एक संवेदनशील राष्ट्र है। जिससे हमारे काफी पुराने और लम्बे सम्बंध हैं।” हंगरी और बुल्गारिया ने भी अमेरिकी प्रस्ताव का विरोध किया। हां, लाटेविया ने साथ देने की घोषणा की। हंगरी और चेक ने रूस से अपने आर्थिक सम्बंधों को विकसित कर लिया है। इस तरह पूर्वी यूरोप के पूर्व समाजवादी देशों ने सीरिया के द्वारा रासायनिक हथियारों के उपयोग को आधार बना कर अमेरिकी हमले को अपनी मंजूरी नहीं दी। यहां तक कि यूरोपीय संघ के महत्वपूर्ण देश -जर्मनी, फ्रांस और इग्लैण्ड में भी हमले के प्रस्ताव का विरोध किया गया। इग्लैण्ड के प्रधानमंत्री के प्रस्ताव को वहां की संसद से स्वीकृति नहीं मिल सकी। यूरोप की आम जनता मौजूदा दौर में किसी भी युद्ध के खिलाफ है। वो इस बात को स्वीकार करने की स्थिति में नहीं है, कि सरकारें जन समस्याओं का समाधान करने के बजाये युद्ध का नया खर्च उनपर लादे। वो अपने देश की सरकार, उसकी नवउदारवादी-मुक्तबाजारवादी वित्तीय नीति और कटौतियों के खिलाफ है। कर्ज का संकट झेल रहे यूरोपीय देशों मे यूरोपीय संघ और अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय इकार्इयों के खिलाफ गहरा जन असंतोष है। यह जनअसंतोष अमेरिकी सरकार के खिलाफ भी है। जो युद्ध को पैसा बनाने का जरिया समझ रही है। जोस अल्वारेज़ ने सीरिया पर अमेरिकी हमले के बारे में कहा ”मैं इस युद्ध के खिलाफ हूं।” जोस एक अमेरिकी बेरोजगार हैं, जो मानते हैं कि ”हमें दुनिया भर की समस्याओं में शामिल नहीं होना चाहिये। मगर अमेरिकी सरकार पर उन धनिकों का दबाव है, जो मानते हैं कि युद्ध डालर बनाने का जरिया है।” ओबामा सरकार इन सच्चार्इयों की अनदेखी करती रही है। वह इस सच्चार्इ को भी स्वीकार करने की स्थिति में नहीं है, कि अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय इकार्इयां, निजी कम्पनियां और कारपोरेशन ही युद्ध का लाभ उठाते हैं। युद्ध के जरिये अपनी अर्थव्यवस्था को संभालने की उसकी नीतियां, उसकी अपनी वित्तीय संरचना की वजह से नाकाम हैं। और चाह कर भी वह अपनी इन नाकामियों से पीछा नहीं छुड़ा सकता। सारी दुनिया पर अमेरिकी एकाधिकार या 21वीं सदी को अमेरिकी सदी में बदलने का खयाल, महज एक खयाल है। सीरिया के पतन से मध्य-पूर्व एशिया पर अमेरिकी वर्चस्व की नीतियां ही गलत हैं। इराक से लेकर लीबिया के पतन तक की घटनाओं ने हर कदम पर यह प्रमाणित किया है, कि युद्ध और हमलों से अपनी स्थिति मजबूत करने की उसकी नीतियों ने ना सिर्फ उसकी विश्वस्नियता को घटाने का काम किया है, ओबामा से पाली गयी अपेक्षाओं को, ओबामा की नीतियों ने ही ध्वस्त कर दिया है। जो इस बात का प्रमाण है कि अमेरिकी राष्ट्रपति जो कर रहे हैं, उसके अलावा और कुछ नहीं कर सकते। उसका रिपबिलकन या डेमोक्रेटिक होना कोर्इ महत्व नहीं रखता। वह एक ऐसी काली किताब है, जो व्हार्इट हाउस में रहते हैं। सीरिया के जिन विद्रोहियों को अमेरिकी सरकार और पश्चिमी देशों का समर्थन हासिल है, उनके आतंकवादी होने के सैंकड़ों प्रमाण में एक और प्रमाण जुड़ गया है। चर्चित बि्रटिश डिफेन्स कन्सलटेन्सी -एच आर्इ एस जोन्स के एक अध्ययन से यह सुनिश्चित होता है, कि सीरियायी विपक्ष में इस्लामी ताकतों का वर्चस्व है। एडव्हांस प्रेस ने रिपोर्ट दिया है, कि जोन्स के अनुसार सीरियायी विपक्ष की कुल तादाद लगभग 1,00,000 है, जो 1,000 गुटों मे बंटा है। इन एक लाख लोगों में से लगभग 10,000 लोग विद्रोहियों के लिये लड़ते हैं, जो सीधे तौर पर अल-कायदा से जुड़े अल-नुसरा फ्रण्ट और इस्लामिक स्टेट इन इराक एण्ड द लीवेन्ट जैसे आतंकी संगठनों से जुड़े हैं। इन्हीं के द्वारा विद्रोह का नेतृत्व किया जाता है, और इन्हीं के कब्जे में उत्तरी सीरिया के ज्यादातर तेल के कुंवे और अनाज भण्डार हैं। इनमें से कर्इ विदेश समर्थित विद्रोही जेहादी हैं, जो कि सीआर्इए और इस तरह के दुनिया के अलग-अलग देशों के गुप्तचर इकार्इयों से जुड़े हैं। राष्ट्रसंघ अधिकारी पाल पिनेरो के एक तात्कालिक रिपोर्ट के अनुसार, उन्होंने कहा- ”पूरे उत्तरी सीरिया में उग्रवादी सरकार विरोधी हथियारबद्ध गुटों के द्वारा किये गये अपराध और यातना देने की घटनायें अपने चरम पर हैं। साथ ही ऐसे विदेशी विद्रोहियों की घुसपैठ भी हो रही है। ये बि्रगेड़ उन विद्रोहियों से बने हैं, जो कि सीरिया, सीरिया की सीमा से देश में घुसे हैं, अल-मुजाहिदीन उनमें सबसे ज्यादा सक्रिय है। जोन्स के अनुसार- अन्य 35,000 विपक्ष-विद्रोहियों का दृष्टिकोंण अल-कायदा जैसा ही है। 30,000 विद्रोही अपेक्षाकृत नियंत्रित एवं उदार हैं, हालांकि ये भी खुंख्वार इस्लामी होते हैं- जैसे- अल-फरोग बि्रगेडस। जिन्हें अमेरिकी सरकार न सिर्फ हथियारों की आपूर्ति कर रही है, बल्कि कूटनीतिक समर्थन दे रही है। वित्तीय सहयोग दे रही है। जिन्हें सीरिया की आम जनता का वास्तविक प्रतिनिधि कहा जा रहा है। जो कत्लेआम कर रहे हैं। और कत्ल का आरोप बशर-अल-असद सरकार की सेना पर थोप दिया जाता है। रासायनिक हथियारों के उपयोग का मुददा भी कुछ ऐसा ही है। बि्रटिश हथियार उत्पादक कम्पनी -बि्रटम- के द्वारा जिसकी आपूर्ति की गयी। सीरिया में हुए रासायनिक हथियारों से हमले पर राष्ट्रसंघ जांच दल की रिपोर्ट में इस बात का उल्लेख है, कि ऐसे हथियारों का इस्तेमाल किया गया है, किंतु यह बताना मुश्किल है, कि किसने किया? इस बात के ठोस प्रमाण नहीं हैं, कि रासायनिक हमला सीरिया की सेना की। इस रिपोर्ट में कहा गया, कि ”इस बात के स्पष्ट और अकाटय प्रमाण हैं, कि जमीन से जमीन पर मार करने वाले ऐसे मिसाइलों का उपयोग किया गया है, जिसमें सरिन गैस था।” पश्चिमी मीडिया इस बात को असद सरकार पर यह कह कर थोप रही है, कि ऐसे मिसाइल सीरिया की सेना के पास हैं। जबकि पश्चिमी देश एवं स्वयं अमेरिका ने विद्रोही आतंकियों को जमीन से जमीन पर मार करने वाले मिसाइलों की सप्लार्इ की है। मतलब, ऐसे मिसाइल सेना के अलावा आतंकियों के पास भी हैं। जिस सरिन गैस का उपयोग रासायनिक हथियार में किया गया है, उसके बारे में रसियन प्रसिडेणिसयल एडमिनिस्ट्रेशन के प्रमुख सर्गेर्इ इवानोव ने कहा है कि ”सोवियत संघ के द्वारा किसी भी देश को, ना ही सीरिया को, वारहेडस नहीं दिया गया है।” जिसमें रासायनिक हथियारों को ले जाया जाता है। इसलिये, सीरिया की सेना के द्वारा रासायनिक हमला वास्तव में पश्चिमी देश और ओबामा सरकार के बकवास के अलावा और कुछ नहीं है, जैसा कि पुतिन ने भी कहा। इसके बाद भी, सीरिया के खिलाफ हमले की कार्यवाही करने के पक्षधर ओबामा अंतहीन बकवास कर रहे हैं। रूस को अपने पक्ष में लेने की आखिरी कोशिश सउदी अरब के गुप्तचर एजेन्सी के प्रमुख प्रिंस बंदर-बिन-सुल्तान के माध्यम से की गयी। सीरिया में हुए रासायनिक हमले से पहले, प्रिंस बंदर-बिन-सुल्तान और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के बीच एक गुप्त बैठक हुर्इ थी। जिसकी खबर लेबनान के एक अखबार और बाद में रूस में भी प्रकाशित हुर्इ। जिसने सीरिया युद्ध और 15 अप्रैल को बोस्टन मैराथन में हुए बम विस्फोट में सउदी अरब और स्वयं अमेरिका की सम्बद्धता को उजागर कर दिया, और कर्इ सवाल खड़े हो गये। इस रिपोर्ट से यह साफ हो जाता है, कि सीरिया में जारी गृहयुद्ध और बोस्टन धमाके में अमेरिका समर्थित सउदी अरब के द्वारा नियंत्रित आतंकियों का हाथ है। asia (2)रूस के राष्ट्रपति पुतिन के नोवा-ओगारयोवो रेसिडेंस में बंदर-बिन-सुल्तान और पुतिन के बीच 4 घण्टे लम्बी वार्ता हुर्इ। जिसमें बंदर-बिन-सुल्तान ने रूस के सामने कर्इ आकर्षक एवं लुभावने प्रस्ताव रखे, ताकि रूस सीरिया की असद सरकार को अपना समर्थन देना बंद कर दे, विशेषकर राष्ट्रसंघ सुरक्षा परिषद में। प्रिंस बंदर ने पुतिन को सउदी अरब के शासक की ओर से शुभकामना देते हुए कहा, कि ”शाह का जोर दोनों देशों के द्विपक्षीय सम्बंधों को विकसित करने पर है।” उन्होंने आगे कहा कि ”यदि हम किसी समझौते या सहमति पर पहुंचते हैं, तो शाह इसके प्रति कृतज्ञ होंगे।” उन्होंने कहा- ”यदि हम किसी सहमति पर पहुंचते हैं, तो यह सिर्फ सउदी अरब और रूस की सहमति नहीं होगी, बल्कि यह रूस और अमेरिका की आपसी सहमति भी होगी। क्योंकि इस यात्रा से पहले मैंने इस बाबत अमेरिका से बातें की है, और उन्होंने यह विश्वास दिलाया है कि वो इस समझौते के प्रति प्रतिबद्ध होंगे, यदि हम सीरिया के मुददे पर सहमत होते हैं।” प्रिंस बंदर और व्लादिमीर पुतिन की बातों का जो खुलासा हुआ है, वह अपने आप में अजीब है। प्रिंस बंदर उस गुर्गे की तरह बात कर रहे थे, जिसे अपने फायदेमंद पेशकश पर जरूरत से ज्यादा भरोसा है, और जो अपनी ताकत पर उससे भी ज्यादा यकीन करता है। उनकी बातें प्रलोभन और दबाव के बीच की ऐसी घुड़की है, जिसे पूरा करने की ताकत उसमें नहीं है। बंदर-बिन-सुल्तान ने पुतिन से कहा- ”हमारे बीच ऐसे कर्इ समान मूल्य और उददेश्य हैं, जो हमें साथ ला सकते हैं, विशेष कर उग्रवाद और आतंकवाद के खिलाफ संघर्ष। विश्व शांति और सुरक्षा को बढ़ाने और उसे मजबूत करने के लिये।” इसके लिये उन्होंने रूस और अमेरिका तथा अपने अलावा यूरोपीय संघ का भी उल्लेख किया। अरब क्रांति का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा- ”अरब क्रांति से पैदा हुर्इ घटनाओं से आतंकवादी दबाव बढ़ रहा है। हमने कर्इ क्षेत्रों को गवां दिया है। उसके बदले हमें आतंकी अनुभव मिले हैं, मिस्त्र में मुसिलम ब्रदरहुड और लीबिया में उग्रवादी गुट इसका सबूत है।” बंदर-बिन-सुल्तान ने उदाहरण देते हुए कहा कि ”मैं आपको अगले साल काला सागर पर मौजूद सोचि शहर (रूस) में होने वाले विन्टर ओलमिपक को ‘प्रोटक्ट’ करने की गारण्टी दे सकता हूं। चेचेन्या ग्रूप, जो कि इस खेल आयोजन के लिये खतरा है, हमारे नियंत्रण में है, वो हमसे ही नियंत्रित होते हैं। वे हमसे पूछे बिना सीरियायी क्षेत्र में कोर्इ भी कार्यवाही नहीं करेंगे। यह ग्रूप हमें डरा नहीं सकते। हम सीरियायी क्षेत्र में इनका उपयोग करते हैं।” उन्होंने आश्वस्त किया कि ”सीरिया के राजनीतिक भविष्य में, आने वाले राजनीतिक कल में इनकी कोर्इ भूमिका नहीं होगी।” इस लम्बे वार्ता के दौरान राष्ट्रपति पुतिन ने कहा- ”हमें पता है, कि आप पिछल दशक से चेचेन्या आतंकी गुटों का समर्थन कर रहे हैं।” उन्होंने कहा- ”वार्ता के दौरान आपने जिस अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद से संघर्ष का जिक्र किया, और जिसे आपने कामन आब्जेकिटव्स बताया, दोनों ही एक-दूसरे के विरूद्ध हैं। हम सैद्धांतिक रूप से मजबूत और स्पष्ट सम्बंधों को बढ़ाने में दिलचस्पी ले सकते हैं।” बंदर-बिन-सुल्तान ने एक संयुक्त रूसी-सउदी तेल नीति का प्रस्ताव रखा, जिसके अंतर्गत तेल के कीमतों में वृद्धि की जाये, जिससे दोनों देशों को भारी लाभ होगा। रूस की लगभग 40 प्रतिशत अर्थव्यवस्था ऊर्जा एवं तेल के निर्यात पर निर्भर है। प्रिंस बंदर ने वादा किया कि ”सीरिया में अमेरिकी नेतृत्व में परिवर्तन के बाद, सीरिया में पार्इप लार्इन बिछाने की उस योजना के तहत निर्माण नहीं किया जायेगा, जिससे मध्य-पूर्व एशिया के तेल एवं गैस की आपूर्ति यूरोप के बाजारों में की जानी है। रूस के लिये वहां व्यावसायिक प्रतिद्वन्दिता खड़ी नहीं की जायेगी।” प्रिंस बंदर ने आगे कहा कि ”हम रूस के यूरोप जाने वाले गैस पार्इप लार्इनों के महत्व को जानते हैं। हम वहां कोर्इ प्रतिद्वन्दिता खड़ा नहीं करेंगे। हम ऐसी व्यावसायिक प्रतिद्वन्दिता में विश्वास नहीं करते।” रूस की अर्थव्यवस्था की मजबूती और यूरोपीय बाजारों में उसकी उपस्थिति का महत्व आसानी से समझा जा सकता है। रूस के राष्ट्रपति पुतिन ने प्रिंस बंदर-बिन-सुल्तान के प्रस्ताव को खारिज कर दिया। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि ”क्रेमलिन सीरिया के संकट का राजनीतिक समाधान ढंूढेगा और राष्ट्रसंघ सुरक्षा परिषद में सीरिया और र्इरान के खिलाफ उठाये गये नये कदम एवं प्रस्तावों का विरोध करने की नीति पर ही चलेगा।” उन्होंने अपनी वैचारिक एवं युद्ध के विरूद्ध शांति एवं सहयोग की नीति का जिक्र किया। जोकि, निश्चय ही प्रिंस बंदर के लिये अप्रत्याशित था। परिणाम स्वरूप प्रिंस बंदर ने सीरिया में युद्ध जारी रखने के संकेत दिये। उन्होंने कहा- ”सीरिया में संघर्ष अब और तेज होगा। वहां सैन्य हस्तक्षेप के अलावा अब और कोर्इ रास्ता नहीं बचा है, क्योंकि यही एक मात्र विकल्प बचा है।” उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि ”राजनीतिक समाधान का अंत गतिरोध पर होगा।” इस वार्ता के तीन सप्ताह बाद ही सीरिया में रासायनिक हमला हुआ। प्रिंस बंदर ने कहा था- ”हमला तेज होगा। सैन्य हस्तक्षेप के अलावा और कोर्इ विकल्प नहीं है।” महीनों पहले से ही अमेरिका और उसके मित्र देश रासायनिक हथियारों का उपयोग होने पर, सीरिया पर हमला तय है, का राग अलाप रहे थे। और इसे मुददा बनाया गया। इस रिपोर्ट ने सीरिया के संकट के साथ बोस्टन मैराथन बम धमाका पर भी कर्इ सवाल खड़े कर दिये हैं। एक बार फिर यह प्रमाणित हो गया है, कि 10 साल पहले इराक युद्ध की तरह ही सीरिया युद्ध भी अमेरिका और यूरोपीय देशों के द्वारा प्रचारित झूठ पर आधारित है। दो साल पहले लीबिया पर हमला भी एक रचा हुआ झूठ था। इसके बाद भी अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा को इस बात का अफसोस है, कि विश्व जनमत और विश्व समुदाय उनकी बातों पर यकीन नहीं कर रही है। उन्हें सीरिया पर हमले की इजाजत मिलनी चाहिये। इराक, अफगानिस्तान, लीबिया के बाद सीरिया में तबाही का एक नया मंजर उनकी ख्याति के लिये जरूरी है। बोस्टन बम धमाका के बारे में वो क्या कहेंगे? यदि बंदर-बिन-सुल्तान ने कहा कि सउदी अरब चेचेन्या के इस्लामी आतंकी गुटों को नियंत्रित करता है, तो 15 अप्रैल को बोस्टन मैराथन बम धमाके पर यह सवाल तो खड़ा होता ही है, कि यदि चेचेन्या आतंकी गुट सीरिया पर हमला तेज करने के लिये सउदी अरब और अमेरिकी अधिकारियों से अनुमति लेते हैं, तो अमेरिका के बोस्टन मैराथन पर हमले की अनुमति उन्होंने नहीं ली होगी? जिसमें सैंकड़ों घायल हुए और तीन लोगों की जानें गयीं। तो क्या इसका मतलब यह नहीं निकलता है, कि अमेरिकी सरकार अपने ही लोगों पर अब आतंकी हमले करा रही है? यदि 911 पर हमें शक है, तो गलत क्या है? यदि हम इराक, अफगानिस्तान, लीबिया, टयूनीसिया और सीरिया की वारदातों के खिलाफ हैं, तो क्या गलत है? आज दुनिया की तमाम विस्फोटक समस्याओं के मूल में अमेरिकी साम्राज्य है। इसके बाद भी अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबाम कहते हैं- ”दुनिया आज संयुक्त राज्य अमेरिका की मेहरबानियों से ही अच्छी है, और इसके लिये दुनिया को उसे धन्यवाद कहना चाहिये।” बराक ओबामा जी के इस वक्तव्य को यदि हम विश्व जनमत के सामने सवाल बना कर पेश करें, तो जवाब में तीन-चौथार्इ से अधिक लोगों की समवेत आवाज सुनार्इ पड़ेगी- ”धिक्कार है!”

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