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क्या हम, तीसरे विश्वयुद्ध के मुहाने पर खड़े हैं? – 3

soldiersविश्व परिदृश्य बदल गया है।

एक ओर नवउदारवादी वैश्वीकरण है, जिनके पीछे एकाधिकारवादी शकितयां हैं। किंतु इन शकितयों के पीछे भी रूस और चीन जैसी एकाधिकारवादी शकितयां हैं। जो बहुध्र्रुवी विश्व की अवधारणा का साथ दे रहे हैं।

दूसरी ओर समाजवादी वैश्वीकरण है, जिसके पीछे दुनिया की प्रगतिशील जनवादी शकितयां हैं।

दुनिया के पुर्न बंटवारे का सवाल खड़ा हो गया है, किंतु, यह बंटवारा तीसरी दुनिया के देशों को गुलाम बनाने और उन्हें लूटने के लिये नहीं है। लूटेरे अब बंटवारा नहीं चाहते, वो एकाधिकार चाहते हैं। इसलिये, यह बंटवारा एकध्रुवी विश्व और एकाधिकार के विरूद्ध है। वैसे भी, समाजवादी वैश्वीकरण दुनिया के बंटवारे का प्रस्ताव कभी नहीं रहा है। औपनिवेशिक शकितयां और साम्राज्यवादी ताकतें हीं, शकित के आधार पर दुनिया के बंटवारे का प्रस्ताव रखती और उसके लिये लड़ती रही हैं। अब तक हुए दोनों विश्वयुद्ध का आधार ही यही रहा है। आज भी अमेरिकी साम्राज्यवाद दुनिया पर अपने आधिपत्य को बनाये रखने के लिये ऐसी लड़ार्इ लड़ रहा है, जिसे वह वैश्वीकरण कहता है। जो वास्तव में दुनिया में अमेरिकी आधिपत्य के लिये जनतंत्र के नाम से लड़ी जा रही है।

हम वैश्वीकरण का विरोध नहीं करते। वैश्वीकरण ज्ञान, विज्ञान और विकास की स्वाभाविक सिथतियां हैं। दुनिया का आपस में जुड़ना ऐतिहासिक विकास की अवस्था है। हमारा विरोध नवउदारवादी वैश्वीकरण से है। हम बाजारवादी वैश्वीकरण के विरूद्ध हैं। जो हमें बाजार में खड़ा कर, हमसे हमारा सब कुछ खरीद और छीन लेना चाहता है, और कहता है कि वह सस्ते में सबकुछ बेच रहा है। जबकि भूख, गरीबी और बेकारियां हमसे बेचता है। हमसे हमारी जमीन, हमारी खनिज एवं वन सम्पदा, नदियों का पानी और जीने के वे संसाधन छीन लेता है, जिसके बिना आदमी जी नहीं पाता। हम उस उदारीकरण के खिलाफ हैं जो जातीय हिंसा, राष्ट्रवादी घृणां और हथियारों से हमला करता है। जिस देश और दुनिया को हमने बनाया है, उस देश और दुनिया पर अपनी हुकूमतें चलाता है। यूरोपीय देश और अमेरिकी साम्राज्य ने तीसरी दुनिया के देशों के साथ सदियों से ऐसा ही किया है, और वो यही करते रहना चाहते हैं। हम इसी नवउदारवादी वैश्वीकरण के खिलाफ है। हम मरती हुर्इ व्यवस्था के वैश्वीकरण के विरूद्ध हैं। उसे बचाने की अंतिम लड़ार्इ के विरूद्ध हैं।

वित्तीय साम्राज्यवाद ने राज्य की सरकारों को वित्तीय इकार्इ और हमलावर हत्यारा बना चुकी है। वह अपने को बचाने के लिये आम आदमी को बड़ी तादाद में मार चुका है और उसकी योजना लगातार लोगों को मारते रहने की है। उसने आम आदमी को मारने वाली ऐसी व्यवस्था का निर्माण किया है कि आम आदमी भूख, गरीबी और कुपोषण से मरता है। प्राकृतिक आपदा और बीमारियों से मरता है। युद्ध, हमला और हथियारों से मरता है। दमन, उत्पीड़न और अत्याचारों से मरता है। वह अमानवीय सिथतियों में काम करते हुए और बेकारी से मरता है।

हमने देख और जान लिया है कि हथियारों की होड़ और शीतयुद्ध के बीच शिविरों में विभाजित विश्व, आज के एकाधिकारवादी विश्व से कहीं ज्यादा सुरक्षित था। अमेरिकी एकाधिकारवाद ने विश्वव्यापी वित्तीय संकट, आर्थिक अनिश्चयता और सामाजिक असुरक्षा तथा राजनीतिक असिथरता के अलावा और हमें कुछ नहीं दिया है। आज दुनिया के किसी भी देश का सुरक्षित न होना, इस बात का प्रमाण है कि विश्व की मौजूदा व्यवस्था गलत है, पूरी तरह गलत है। और इस गलत को ही बनाये रखने के लिये लड़ार्इयां लड़ी जा रही हैं। ऐसी सिथतियां बनार्इ जा रही हैं कि सीरिया हो या र्इरान, फिलिस्तीन हो या अफगानिस्तान, चीनी सागर में बढ़ता तनाव हो या अदन की खाड़ी, की बढ़ती निगरानियां, साम्राज्यवादी तर्कों से युद्ध अनिवार्य हो जाये। हथियारों के प्रतिरोधक और मारक क्षमता में विस्तार, सैन्य समझौते और सैन्य अभ्यास, और विकास को ताक पर रखकर हथियारों की खरीदी हो रही है।

आज जो सिथतियां बन गयी हैं, वह पिछले किसी भी विश्वयुद्ध के पहले की सिथतियां हैं। दुनिया भले ही घोषित रूप से दो सैनिक शिविरों में विभाजित नहीं है, किंतु नाटो सैन्य संगठन और दुनिया भर में फैले 1000 से ज्याद अमेरिकी सैन्य ठिकानों ने असुरक्षा की नयी भावना पैदा कर दी है, क्योंकि इराक के बाद अफगानिस्तान और अफगानिस्तान के बाद लीबिया और फिर लीबिया के बाद सीरिया के मुददे को खड़ा किया गया है, जिसका समाधान साम्राज्यवादी यूरोपीय और अमेरिकी शकितयां सीरिया पर कठोर कार्यवाही के रूप में सैन्य हमला चाहती है। सीरिया को इराक और लीबिया की तरह तबाह करना उनका मकसद है। र्इरान और फिलिस्तीन पर हमले की सिथतियां बनायी जा चुकी हैं। साम्राज्यवादी युद्ध उन्माद के प्रति स्वाभाविक विरोध और सम्बंधित देशों के बीच सैन्य एकजुटता बढ़ी है। माना यही जा रहा है कि यदि सीरिया पर नाटो संगठन का हमला होता है तो र्इरान सबसे पहले सीरिया के पक्ष में अपनी सेना उतारेगा और रूस का सैन्य दबाव भी वहां बढ़ेगा। शांतिवार्ता और युद्धविराम की असफलता उसे सीरिया के पक्ष में खड़ा कर देगी। चीन का तटस्थ रहना भी मुशिकल हो जायेगा। वैसे भी, तुर्की में नाटो संगठन द्वारा पेटि्रयाट मिसाइलो की तैनाती को गलत करार देते हुए उसने घट रही घटनाओं पर नजर रखने की बात की है।

यदि रूस और चीन की संगठित सैन्य क्षमता ‘एकजुट’ होती है तो सैन्य शिविरों का निर्माण स्वाभाविक हो जायेगा। नाटो सैन्य संगठन और अमेरिकी साम्राज्यवाद के विरूद्ध रूस, चीन और उनके मित्र देशों की सम्बद्धता भी हो जायेगी। अमेरिका, यूरोपीय संघ और नाटो संगठन एक ओर होंगे, जिन्हें युद्ध की अनिवार्यता है। जो युद्ध के जरिये ही अपने वैशिवक वर्चस्व को बनाये रखना चाहते हैं। दूसरी ओर दुनिया की शेष शकितयों की एकजुटता स्वाभाविक होगी, जो शांति एवं कूटनीतिक हल के पक्षधर हैं।

वैशिवक मंदी ने पूंजीवादी वैशिवक व्यवस्था की विसंगतियों को खुलेआम कर दिया है। यह खुलेआम है कि यूरोपीय देश और अमेरिकी साम्राज्य की समृद्धि तीसरी दुनिया का अबाध शोषण एवं उनकी प्राकृतिक संपदा का दोहन है। वैश्वीकरण तीसरी दुनिया के देशों की संपदा और उनके बाजार पर आधिपत्य जमाने की सोच है। वह बदलते हुए वित्तीय एवं सैन्य संतुलन को साम्राज्यवादी हितों के पक्ष में नियंत्रित करने की नीति है। अमेरिका के वित्तीय साम्राज्यवाद का आधार वैशिवक मुद्रा के रूप में डालर का प्रचलन है। जिसे न सिर्फ चीनी मुद्रा युआन की गंभीर चुनौतियां मिल रही हैं, बलिक लातिनी अमेरिकी देशों के संगठन ‘अल्बा’, वैशिवक संगठन, ‘बि्रक्स’ और अन्य 9 समझौतों से चुनौतियां मिल रही हैं। जिस दिन वैशिवक मुद्रा के स्थान से डालर और तेल व्यापर से पेट्रो डालर बाहर हो जायेगा, उस दिन ही अमेरिकी वर्चस्व का अंत हो जायेगा। चीन के युआन और अन्य 11 समझौतों से उसकी औकात घटती जा रही है। समानांतर वैशिवक वित्तव्यवस्था की शुरूआत हो चुकी है। राजनीतिक रूप से भी उसे बहुधु्रवी विश्व की सोच का सामना करना पड़ रहा है।

शीतयुद्ध की समापित को सोवियत संघ के पतन और समाजवादी सोच की चुनौती की समापित के रूप में देखने की अमेरिकी भूल ने, इसे पूंजीवाद और पूंजीवादी सोच की जीत मान लिया। वार्सा संधि के देशों ने वार्सा सैन्य संधि एवं संगठन के समापित की घोषणा तो कर दी, किंतु साम्राज्यवादी देशों ने नाटो सैन्य संगठन को बनाये रखने का निर्णय लेकर शीतयुद्ध की समापित के बाद, शांति की संभावनाओं का अंत कर दिया। इस बात को न समझने की गहरी भूल की गयी कि ‘पूंजीवाद एक संक्रमणकालीन व्यवस्था है’ और ‘सोवियत संघ तथा पूर्वी यूरोप के समाजवादी देशों के पतन से माक्र्सवाद असंदर्भित नहीं हुआ है। परिणाम हमारे सामने है, कि माक्र्सवाद की नयी संभावनाओं ने जन्म ले लिया है, और पूंजीवादी वैशिवक व्यवस्था न सिर्फ संकटग्रस्त है, बलिक युद्ध एवं आम संकट से घिरी हुर्इ है। उसकी संभावनाओं का अंत हो चुका है।

इन्हीं संभावनाओं के अंत ने उसे खुंख्वार बना दिया है। उसने आतंकवादी और निजी सेनाओं के रूप में पेशेवर हत्यारों को संगठित कर लिया है। उसके पास संगठित सेना, हथियारों का जखीरा और एक विश्वसनिय प्रचारतंत्र है। जो युद्ध और युद्ध की आशंकाओं को फैला रहा है। वह हमले की पृष्टभूमि बनाता है, और दुनिया के सामने साम्राज्यवादी देशों को मानवाधिकार और जनतंत्र का समर्थक प्रमाणित करता है। वह बुनियादहीन आरोपों को विश्वसनिय बनाता है। जब इराक पर बहुराष्ट्रीय सेनाओं ने हमला किया, उससे पहले ही इराक को विश्व शांति के लिये सबसे बड़ा खतरा और सददाम हुसैन को तानाशाह बनाया गया। इराक के विरूद्ध राष्ट्रसंघ से प्रस्ताव पारित कराया गया। लीबिया और लीबिया में कर्नल गददाफी के साथ भी यही किया गया। उनके खिलाफ आयातित आतंकी और घुसपैठियों से विद्रोह कराया गया। उनके दमन और अपने देश को साम्राज्यवादियों से बचाने के लिये की गयी कार्यवाहियों को मानवाधिकार के विरूद्ध प्रचारित किया गया। राष्ट्रसंघ सुरक्षा परिषद से ‘नो फ्लार्इ जोन’ का प्रस्ताव पारित हुआ और नाटो सेना के द्वारा हवार्इ हमले हुए, कतर की सेना विद्रोहियों के साथ मिलकर जमीनी लड़ार्इ लड़ी, आतंकी गुटों ने टीएनसी का गठन किया।

सीरिया में भी यही हो रहा है। जार्डन में इराक से वापस हुर्इ अमेरिकी सेना डंटी है। तुर्की की संसद से सीरिया पर हमले का प्रस्ताव पारित करा लिया गया है। सीरिया की सीमा पर तुर्की में नाटो ने पेटि्रयाट मिसाइलें तैनात कर दी है। कतर की राजधानी दोहा में सीरिया के राष्ट्रपति बशर-अल-असद की सरकार के विरूद्ध विपक्ष और विद्रोहियों को संगठित कर एक प्रवासी सरकार का गठन किया गया है। साम्राज्यवादी अमेरिका और यूरोपीय संघ उन्हें आर्थिक सहयोग, हथियारों की आपूर्ति और कूटनीतिक समर्थन दे रहे हैं। सीरिया के विरूद्ध हमले के प्रस्ताव का राष्ट्रसंघ के सुरक्षा परिषद में बार-बार रखा जा रहा है, किंतु चीन और रूस के द्वारा विटो पावर का उपयोग कर उसे निरस्त कर दिया जाता है। लेकिन सीरिया में सैन्य कार्यवाही की सिथतियां पहले से ज्यादा मजबूत हो गयी हैं। माना यही जा रहा है कि 2013 में सीरिया पर निर्णायक हमला होना तय है, और 2014 में र्इरान के खिलाफ सैन्य कार्यवाही संभावित है।

सीरिया और र्इरान के मुददे ने विश्व को विभाजित कर दिया है। और विभाजित विश्व कूटनीतिक ही नहीं अपनी सैन्य शकित के साथ एक-दूसरे के विरूद्ध खड़ी होती जा रही है।

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