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बाजार में बसंत गिफ्ट पैक तो नहीं?

बाजार में बसंत गिफ्ट पैक तो नहीं?‘आज
बसंत पंचमी है‘,
अखबार के
रंगीन पन्नों ने खबर दी।
मगर
बसंत कहीं नजर नहीं आया,
कि अगवानी करूं
किसी ठेले से खरीद कर
साथ में चाय ही पी सकूं,
पूछूं- प्रवास कितने दिनों का है?
और साथ चलती सर्दी से हाथ मिला कर
उसे विदा कह सकूं।

बुरी बात है
मगर क्या करूं?
अगवानी और विदाई की
दस्तूरों से कटा हुआ हूं मैं।
सर्दी से कह नहीं सका
कि ‘‘जो भी गुजरा, अच्छा गुजरा।‘‘
सर्द हवाओं की फटकार मिली,
मूसलाधार बारिश हुई,
धुंध में लिपटे रहे शहर,
और दुनिया भर में भारी बर्फबारी हुई।
मौसम से
घमासान के बीच
हमने
दोस्ताना लड़ाईयां भी लड़ी।

हाथ-पांव ठण्डे हुए,
जोड़ों में दर्द हुआ, हड्डियां भी जमीं,
कोसा एक-दूसरे को हमने
फिर भी
हमें जो करना था, हमने वह किया
बंद खिड़की-दरवाजों को थपथपाते रहे तुम
और हम अपनी मांद में दुबके रहे।
‘तुमने
बुरे वक्त में
अच्छे वक्त की तलब बढ़ा दी
चलो, अच्छा हुआ।‘

नहीं
कह सका मैं
कि मिलेंगे अगली बार कहीं और
चलेंगे किसी पहाड़ पर।
रंगीन वादियों पर लदे, बर्फ को हटायेंगे।
बिखेरना तुम बर्फ के बुरादे
और हम
उन पर रंगों को बिखेरेंगे।
यह खेल
हम तब तक खेलेंगे,
जब तक
हमारी दरकी हुई दोस्ती, पक्की नहीं हो जाती।

बसंत का आना
और अदब से तुम्हारा जाना
कुछ खास अच्छा नहीं लग रहा है,
लग रहा है-
कुछ तो ऐसा है, जिसे नहीं होना चाहिये।
समारोहों में
कटे हुए कदली स्तम्भों पर जलता दीया
शुभ है,
मगर,
यह बसंत के परों को कतरना तो नहीं?
सच बताऊं तो
मौसम की मुझे बड़ी फिक्र है
कि कहीं यह बाजार में
बसंत को बेचने का गिफ्ट पैक तो नहीं?

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One comment

  1. RAMESH KUMAR GOHE

    आलोक जी,
    नमस्कार .
    आपकी सभी कवितायेँ अच्छी लगी |विभाग में आपकी कविताओं का पथ हुआ |बसंत कविता का अंश बसंत का आना
    और अदब से तुम्हारा जाना
    कुछ खास अच्छा नहीं लग रहा है,
    लग रहा है-
    कुछ तो ऐसा है, जिसे नहीं होना चाहिये।
    समारोहों में
    कटे हुए कदली स्तम्भों पर जलता दीया
    शुभ है,
    मगर,
    यह बसंत के परों को कतरना तो नहीं?
    सच बताऊं तो
    मौसम की मुझे बड़ी फिक्र है
    कि कहीं यह बाजार में
    बसंत को बेचने का गिफ्ट पैक तो नहीं?

    सबको बहुत भाया |
    बाकी सभी कविताओं कि बहुत तारीफ़ हुई है |
    अच्छी अच्छी कविताओं के प्रकाशन के लिए धन्यवाद |
    रमेश कुमार गोहे

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