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गुलाम, खिलाडि़यों की मंडी

गुलाम, खिलाडि़यों की मंडीबाजार में किसी का भाव चढ़े तो अच्छा लगता है, मगर आदमी की जब बोलियां लगायी जाती हैं, तब लगता है- गुलामों और कनीजों का दौर नहीं गुजरा है। उस दौर की वापसी हो गयी है, जब गुलाम बिकते थे, उन्हें खरीदना अच्छी बात होती थी। गुलामों के व्यापारी होते थे। मुनाफा कमाते थे। रोम की पूरी सभ्यता गुलाम और सलीबों के कंधों पर थी। जो गुलाम उसके खिलाफ खड़ा होते थे, उन्हें सलीब मिलता था, और जो गुलाम उनका मनोरंजन करते थे, उन्हें भयानक मौत। रोम गुलामों से पटा था। खेत-खलिहान से लेकर उद्योग और व्यापार गुलामों के दम पर थे। गुलामों के दम पर ही उनका घर-बाजार और संसद चलता था। और फिर, गुलामी की जंजीरों के टूटते ही रोम की सभ्यता टूट कर बिखर गयी। उसकी दीवारें ढ़ह गयीं। उसके हिंसक मनोरंजन ने ही उसे खोखला किया। उसने एक ऐसे वर्ग की पहचान की जो इतना सुविधाभोगी था, कि अपना बोझ भी उठा नहीं सका, जो शोषण, दमन और युद्ध की बुनियाद पर खड़ी सभ्यता थी। जिनका मनोरंजन गुलामों की घुटी हुई चीख, बिखरी हुई आंतें और चारो ओर फैला खून था।

दो ग्लेडियेटरों को अखाड़े में उतार कर तब तक लड़ाया जाता था, जब तक एक की मौत नहीं हो जाती थी। ग्लेडियेटर खरीदे हुए गुलाम थे। हाट-बाजार में जिनकी बोलियां लगाई जाती थीं। जिन्हें दूसरों के मनोरंजन के लिये बेवजह लड़ाया जाता है। दास महिलाओं से बच्चे, बाजार में बेचने के लिये पैदा किये जाते थे। ग्लेडियेटरों का मालिक उनकी देखभाल इस तरह करते थे, कि वो उनके खिलाफ खड़े न हों। जिनके लिये खेल व्यापार था।

भारत में भी खेल व्यापार हो गया है, और खिलाडि़यों की मण्डियां सजी हैं। बोलियां लगाई गयीं। वो बिके। खबरें सुर्खियों में छपीं। क्रिकेट में खरीददारी महंगी होती है। आईपीएल का यह सातवां सत्र है, और इस सत्र के सबसे महंगे खिलाड़ी युवराज सिंह हैं, जो 14 करोड़ में बिके। ‘रायल चैलेंजर्स बैंगलोर के मालिक विजय माल्या ने उन्हें खरीदा है। दिनेश कार्तिक 12.50 करोड़ में बिके। युवराज सिंह को खरीदने के बाद माल्या ने कहा- ‘‘मैं बेहद खुश हूं। लेकिन यह दूर्भाग्यपूर्ण है कि युवराज को खरीदने के लिये 4 करोड़ अतिरिक्त खर्च करना पड़ा।‘‘ आईपीएल के इतिहास की यह सबसे बड़ी खरीददारी है।

युवराज सिंह चाहें तो दावा कर सकते हैं कि वो भावी भारत रत्न हैं। उनकी दावेदारी के पक्ष में खड़ा किया जा सकता है-

कि, वो सबसे महंगे खिलाड़ी हैं।

कि, उन्होंने कैंसर को फ्रिस्टाइल कुश्ती में पछाड़ा है।

कि, वो भारत के खेल बाजार की समृद्धि के चमक हैं।

देश के मुक्त बाजार के प्रबल समर्थक प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और 2014 के चुनावी घमासान के लिये कमर कसती कांग्रेस चाहे तो इसे अपनी सफलता के कारनामों में गिनती करा सकती है। कह सकती है कि उन्होंने खेल को शानदार व्यापार बना कर देश में खेल और व्यापार के नये अवसर की रचना की है। अब देश एक शानदार मुक्त बाजार है, और लोगों में खेल की अद्भुत भावना का जन्म हुआ है। भारत का खेल बाजार क्रिकेट का सबसे बड़ा खेल बाजार है।

जिसमें देश ही नहीं, दुनिया भर के क्रिकेट खिलाड़ी जमा होते हैं, उनकी बोलियां लगाई जाती हैं। वो बिकते हैं और अपने मालिकों के लिये खेलते हैं। जिसका सीधा प्रसारण होता है। विज्ञापनों का मेला लगता है। सट्टेबाजी और फिक्सिंग होती है। करोड़ों-करोड़ का वारान्यारा होता है। दर्शक जो देखता है, वह आंखों में धूल झोंकना है।

एक टीम लगभग 25 से 35 करोड़ में बनती है।

पूरी खरीददारी लगभग 200 से 300 करोड़ की होती है।

फिर खेल-तमाशे का खर्च नाच-गाना और जश्न का खर्च।

पूरे आयोजन में खर्च की फेहरिश्त बहुत बड़ी है। जिसमें मुनाफा ही मुनाफा है। सबसे हैरत में डालने वाला करिश्मा यह है, कि जीतने और हारने वाले टीम के मालिकों को कोई नुक्सान नहीं होता। चारो ओर सिर्फ कमाई होती है। मुनाफा होता है। सवाल यह है, कि घाटे में कौन होता है? डकैती कहां होती है?

आईपीएल घाटे में नहीं है।

खिलाडि़यों की कमाई पहले से सुरक्षित है।

टीम के मालिक आराम से अपना मुनाफा निकाल लेते हैं।

प्रसारण करने वाले चैनलों के लाभ पर कोई खतरा नहीं है।

विज्ञापनों का बाजार गर्म है।

फिक्सिंग फायदे का सौदा है।

सट्टेबाजों का चित्त भी मेरा, पट्ट भी मेरा।

इन लाभ कमाने वालों की फेहरिश्त के बाद, खेल में यदि कोई बचता है, तो वह दर्शक है, जिसकी जेब धीरे-धीरे कटती है। इस तरह कटती है, कि उसे पता ही नहीं चलता। आप पड़ताल करें, आपको पता चल जायेगा, कि वह घाटे में कैसे है?

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