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आम आदमी पार्टी की सूरत साफ हो रही है

आम आदमी पार्टी की सूरत साफ हो रही हैआम आदमी पार्टी को भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन का पूरा लाभ मिला। और बढ़ती हुई सामाजिक असुरक्षा से नाराज दिल्ली की आम जनता ने विधानसभा चुनाव में, सीमित ही सही, मगर जिस तरह आम आदमी पार्टी का साथ दिया। और चंद दिनों में ही अरविंद केजरीवाल ने जो तेवर दिखाये। और मुख्यधारा की मीडिया ने इसका जिस तरह प्रचार किया, उसमें देश की आम जनता को कांग्रेस और भाजपा के अलावा, एक तीसरे विकल्प की राह मिली। विकल्पों के राजनीति की बड़ी-बड़ी बातें भी उभर कर सामने आयीं।

जिस पर हमने कभी यकीन नहीं किया, क्योंकि हम इस बात को अच्छी तरह जानते थे, कि भारतीय राजनीति में मुक्त बाजारवादी राष्ट्रीय एवं बहुराष्ट्रीय ताकतों ने, अपने लिये बड़ी जगह बना ली है। ‘ई-न्यूज‘ के फरवरी के अंक में हमने राष्ट्रीय मुद्दा के तहत ‘विकल्प की राजनीति‘ का उल्लेख किया और सवाल-दर-सवाल के अंर्तगत ‘‘टोपी को सलेट पट्टी बनाने वाले लोग‘‘ को सवालों के दायरे में रखा। हमारे लिये अरविंद केजरीवाल वित्तीय ताकतों का तीसरा चेहरा ही रहे हैं। और 18 फरवरी को उन्होंने यही सिद्ध भी किया।

देश की शीर्ष उद्योग चेम्बर -सीआईआई के नेतृत्व में आयोजित परिचर्चा के दौरान उन्होंने कहा- ‘‘हम पूंजीवाद के खिलाफ नहीं हैं, बल्कि कुछ सीमित हाथों में इसके सिमट जाने की व्यवस्था के खिलाफ हैं। देश के कुछ उद्योगपति ऐसे हैं, जो कारोबार नहीं करते, बल्कि देश को लूटने का काम कर रहे हैं।‘‘

उन्होंने उद्योगपतियों को आश्वस्त किया कि ‘‘आम आदमी पार्टी निजीकरण के खिलाफ नहीं है।‘‘

उन्होंने अपने भ्रष्टाचार विरोधी तेवर को भी आम जनता की पाली से निकाल कर उद्योगपतियों की पाली में खड़ा कर दिया कि ‘‘भ्रष्टाचार के खत्म होने से उद्योग जगत को लाभ होगा।‘‘ उन्होंने सिद्ध किया कि उनकी लागत घट जायेगी।

केजरीवाल साहब, आपने अच्छा किया।

कांग्रेस की मनमोहन सिंह सरकार भी उद्योग जगत की लागत घटाने के लिये उन्हें सहुलियतें देती रही है।

भाजपा के नरेंद्र मोदी ने भी गुजरात में यही किया, और अब पूरे देश में यही करना चाहते हैं।

और आप भी भ्रष्टाचार घटा कर उनकी लागत घटाना चाहते हैं।

यह तो आप अच्छी तरह जानते हैं न, कि लागत घटाने का मतलब उद्योगपतियों के मुनाफे को बढ़ाना है। उस लाभ को बढ़ाना है, जिसकी कोई सीमा नहीं है।

निजीकरण उत्पादन के साधन पर उद्योगपतियों के स्वामित्व को मानना है। जिसकी स्वीकृति आप खुलेआम करते हैं। और मुक्त व्यापार, बाजार पर वित्तीय ताकतों के कब्जे की नीति है।

और आप यह भी कहते हैं, कि ‘‘हम पूंजीवाद के खिलाफ नहीं हैं।‘‘ आपकी मासूम चाहत है, कि ‘‘यह कुछ लोगों के हाथों तक सीमित न हो‘‘ आप कुछ लोगों के हाथों में पूंजी के सिमट जाने के खिलाफ हैं।

हम तो जानते हैं, मगर आप खुद को समझाने की जहमत उठाईये कि इसका मतलब क्या है?

यदि उत्पादन के साधन पर औद्योगिक घरानों का अधिकार है, और बाजार पर वित्तीय ताकतों का नियंत्रण है, और वित्तीय पूंजी के नियंत्रण में देश की अर्थव्यवस्था है, तो चंद लोगों के हाथों में उसे जाने से आप कैसे रोक सकेंगे? आम जनता की गिरेबां इन ताकतों को थमा कर, आम जनता का भला आप कैसे करेंगे? जिस संसद और सरकार पर इन ताकतों का अधिकार है, वहां झाडू लगा कर सफाई आप किसकी करेंगे? भाजपा और कांग्रेस ने आम जनता के हितों को संसद के बाहर का रास्ता दिखाया, क्या आप उसे उसकी देहरी पर नहीं बैठा रहे हैं? आपकी मासूम चाहत कितनी खतरनाक है? किस मुंह से आप यह सिद्ध करेंगे कि आप उनकी साजिशों का हिस्सा नहीं हैं?

आम जनता के पक्ष में खड़ा होने का क्या मतलब होता है? यदि आपको जानना है, तो लातिनी अमेरिकी देश वेनेजुएला की खोज-खबर लीजिये। जहां सरकार सड़कों पर आ गयी है, और भ्रष्टाचार के खिलाफ सघन अभियान चला रही है। निजी कम्पनियों के लाभ को नियंत्रित किया जा रहा है, और आम जनता को निर्धारित मूल्य पर सामान बेचने को सुनिश्चित किया गया है। जमाखोर कम्पनियों को सामान जप्त हो रहे हैं। उद्योगों का राष्ट्रीयकरण हो रहा है। औद्योगिक एवं उत्पादन इकाईयों को मजदूरों के हाथों में सौंपा जा रहा है। कम्यूनों का निर्माण हो रहा है। देश के प्राकृतिक सम्पदा को निजी हाथों से लेकर उसे राष्ट्रीय सम्पत्ति का दर्जा दिया जा रहा है। आम जनता को वित्तीय अधिकार दिया जा रहा है, और राजसत्ता में उसकी हिस्सेदारी बढ़ायी जा रही है।

जिसके खिलाफ वो ही ताकतें हिंसक वारदातें कर रही हैं, जो दुनिया भर की सरकारों पर अपना नियंत्रण कायम करने में लगी हैं। भारत में जिसके आप तीसरे चेहरे हैं। यह सिर्फ मौजूदा दौर की बात है। जिन्हें विश्वास में लेने के लिये आप आम आदमी के मुखौटे को हटा कर, अपनी सूरत दिखा रहे हैं। और आपने देखा होगा, कि उन्होंने तालियां बजायीं।

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