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आज की दुनिया, सोवियत संघ के विघटन के बाद की दुनिया है

ib8b076b8021324779202792c89bc3a2e_lenin-burial-betting-gambling.nबीसवीं सदी के अंतिम दशक में, 25 दिसम्बर 1991 को सोवियत संघ का विघटन हुआ।

और 30 दिसम्बर 2006 को, इराक में सददाम हुसैन को फांसी दे दी गयी, इराक का पतन हुआ।

आज की दुनिया अमेरिकी साम्राज्य के पतन और वैशिवक मंदी के बीच से गुजर रही है। जहां पूंजीवादी विश्व का बिखरना तय हो गया है। आज जो भी हो रहा है, इन्हीं घटनाओं का परिणाम है। जिसे हम जी और झेल रहे हैं और लड़ भी रहे हैं, आज के हम चश्मददीद गवाह हैं। और उस दिन के भी हम चश्मददीद गवाह थे, जब सोवियत संघ और पूर्वी यूरोप के समाजवादी देशों का पतन हुआ और इराक पर बहुराष्ट्रीय सेनाओं के हमले के बाद सददाम हुसैन का पतन। जिसने दुनिया को एक पांव पर खड़ा कर दिया और यह भी समझा दिया कि एकधु्रवी विश्व का मतलब अमेरिकी मनमानी है।

सोवियत संघ के विघटन ने सारी दुनिया को स्तब्द्ध कर दिया था। सुनी खबरों पर यकीन करना मुशिकल हुआ। लेनिन की विशल प्रतिमाओं को तोड़ा गया। लेनिनग्राद सेंटपिटर्सबर्ग बन गया और सोवियत संघ के झण्डे को रौंदा गया। जर्मनी में बर्लिन की दीवार गिर गयी, पोलैण्ड बदल गया, यूगोस्लोवाकिया, रोमानिया, चेकोस्लोवाकिया और पूर्वी यूरोप के समाजवादी गढ़ का अंत हो गया। वार्सा संधि के देश बिखर गये। यह समझना आसान हो गया कि इतिहास का निर्णायक काल खण्ड खण्डहर हो गया है। विचार और समाजव्यवस्था के रूप में, दुनिया को विकल्पहीन बनाने की कोशिशें थोड़ी देर के लिये कामयाब हो गयी हैं। सोवियत संघ के अंतिम राष्ट्रपति मिखाइल गोर्बाचोव के ग्लासनोस्त और पेइस्त्रोर्इका ने लोगों को धोखे में रखा है कि ”समाजवादी समाज के निर्माण में हम, इतना आगे बढ़ गये हैं, कि वहां से वापस नहीं हुआ जा सकता।” उन्होंने दुनिया के समाजवादी बिरादरी को धोखा दिया।

यूरोप और अमेरिका के पूंजीवादी चेहरे पर मुस्कान बिखर गयी। अमेरिका के तात्कालीन राष्ट्रपति रोनाल्ड रिगन की खुशी जायज थी।

पूंजीवाद के अजेय होने की प्रशसितयां बांटी गयीं।

यह प्रचारित किया गया कि

विश्व शांति के लिये अब कोर्इ खतरा नहीं है, शीतयुद्ध की समापित हो गयी है।

कि माक्र्सवाद असंदर्भित हो गया है।

एडम सिमथ के अध्यायों को फिर से पलटा जाने लगा और राज्य के नियंत्रण से पूंजी को बाहर निकालने के लिये मुक्त बाजारवाद और नवउदारवादी वैशिवकरण के नाम से एकधु्र्रवी अमेरिकी विश्व की दावेदारी पेश की गयी।

आज की दुनिया सोवियत संघ के पतन के बाद की दुनिया है। जहां वैशिवक मंदी है, और अमेरिकी साम्राज्यवाद विश्व शांति के लिये सबसे बड़ा खतरा बन गया है। इस बात के सैकड़ों प्रमाण हैं कि पूंजीवादी विश्व का संकटग्रस्त होना दुनिया से समाजवादी विकल्पों के न होने का भी परिणाम है। सोवियत संघ का न होना समाजवादी विश्व के लिये जितना बड़ा खतरा था, पूंजीवादी विश्व के लिये यह उससे भी बड़ा खतरा प्रमाणित हुआ है, क्योंकि आज माक्र्सवाद की प्रासंगिकता पहले से ज्यादा बढ़ गयी, किंतु पूंजीवादी विश्व के हाथ से उसका आनेवाला कल पूरी तरह से फिसल गया है, अमेरिकी साम्राज्यवाद और उसकी वैशिवक संरचनना तेजी से टूट रही है और यूरोपीय देशों पर कर्ज का इतना बड़ा बोझ है, कि उसे उतार पाना उनके लिये मुशिकल है। उनके लिये पूंजीवादी विकास के रास्ते बंद हो गये हैं, जिस वित्तीय साम्राज्य को उन्होंने खड़ा किया, वहीं साम्राज्यवादी सरंचना उनके पांव में बेडि़यां डाल रही हैं। ऐसा नहीं है कि यूरोप और अमेरिका की आयातित समृद्धि और पूंजी का विशाल भण्डार समाप्त हो गया है और सहसा ही वो कंगाल हो गये हैं। नहीं, ऐसा नहीं हुआ है, हुआ यह है कि पूंजी राज्य के नियंत्रण से बाहर हो गयी है। निजी पूंजी में जर्बदस्त इजाफा हुआ है। राज्य की वित्तीय संरचना पर उनका अधिकार हो गया है। अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष, विश्व बैंक और ऐसी ही अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय इकार्इयों के वो कर्जदार हो गये हैं। राज्य के नियंत्रण से पूंजी के निकलते ही, पूंजीवादी राजनीतिक एवं सामाजिक संरचना पर निजी पूंजी का आधिपत्य कायम हो गया है।

अब सिथतियां ऐसी बन गयी हैं कि पूंजीवाद को अपने ही बनाये वित्तीय जाल से निकलने के लिये, उसे तोड़ना जरूरी है, सामाजिक विकास की दिशा को बदलना जरूरी है, जिसका मतलब है -पूंजीवाद का अंत। जिसे अजेय प्रमाणित करने में उन्होंने अपनी पूरी ताकत लगा दी। आज भी वो यही कर रहे हैं।

माक्र्सवाद का प्रासंगिक हो जाना उनके लिये सबसे बड़ी समस्या है।

साम्राज्यवादी शकितयां नवउदारवादी वैश्वीकरण, मुक्त बाजारवाद और वित्तीय पूंजी के वर्चस्व को बनाये रखने की लड़ार्इयां लड़ रही है। जबकि वैशिवक मंदी ने उन्हें अप्रासंगिक प्रमाणित कर दिया है। उनके निशाने पर तीसरी दुनिया के देश हैं, उन देशों के बाजार और प्राकृतिक संसाधन हैं। वो सारी दुनिया पर अपना एकाधिकार चाहते हैं। दुनिया को सोच और समाज व्यवस्था के रूप में, विकल्पहीन बनाने की उनकी साजिशें आज भी चल रही हैं, जबकि वो स्वयं विकल्पहीन हो गयी हैं। वो आम संकट से घिर गये हैं और उनकी राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय संरचनायें टूट रही हैं। जिसे संभालने के लिये उनके पास दो ही नीतियां हैं-

1. तीसरी दुनिया के देशों पर आधिपत्य।
2. वित्तीय एवं सैन्य विस्तार।

जिसके लिये उन्होंने वैश्वीकरण, लोकतंत्र की बहाली और मानवाधिकार को अपना हथियार बना लिया है।

आर्इये, हम सोवियत संघ और पूर्वी यूरोप के समाजवादी देशों के विघटन के उन प्रभावों का विश्लेषण करें, जो तीसरी दुनिया के देशों के अलावा, यूरोपीय देश और अमेरिकी साम्राज्य पर पड़ा। जिसने उन्हें आधारहीन ही नहीं बनाया, बलिक, सोच एवं समाजव्यवस्था के स्तर पर खोखला भी कर दिया। भले ही प्रचारित यह किया गया कि माक्र्सवादी चुनौतियों का अंत हो गया है।

सोवियत संघ और पूर्वी यूरोप के समाजवादी देशों के विघटन के बाद ही यूरोप और अमेरिका की आम जनता और मजदूर वर्ग के जीवन स्तर में भारी गिरावट दर्ज की गयी। श्रमशकित के पलायन से इन देशों पर नये श्रम शकित का भारी दबाव बढ़ा, जहां अब तक काम के अवसर थे। 1985 में जहां विश्व पूंजीवादी बाजार के सिकंजे में 2.5 बिलियन कामगर थे, वहीं 2000 में ऐसे कामगरों की संख्या 6 बिलियन हो गयी। इण्टरनेशनल लेबर आर्गनार्इजेशन के अनुसार वर्ष 2000 तक पूर्व सोवियत संघ और पूर्वी यूरोप के देश, भारत और चीन द्वारा मुक्त बाजारवादी अर्थव्यवस्था के लिये अपने द्वारा खोल देने से विश्व ‘लेबर फोर्स’ 1.47 बिलियन बढ़ गया, जो पहले से 1.46 बिलियन था, उसमें 1.47 बिलियन का इजाफा हो गया। इन तीनों क्षेत्रों ने मिल कर विश्व मजदूर वर्ग की संख्या दो गुणा से ज्यादा कर दिया। ‘ज्वार्इंट ट्रांसनेशनल कारपोरेशन’ के हाथों में कम मजदूरी में काम करने वाले मजदूरों की नयी खेप लग गयी। परिणाम स्वरूप, अमेरिका के उच्च मजदूरी पर काम करने वाले मजदूरों के स्थान पर तीसरी दुनिया के सस्ते मजदूरी पर काम करने वाले मजदूर उपलब्ध होने लगे। यह दबाव इस लिये और भी बढ़ गया, कि पूर्व सोवियत संघ और पूर्वी यूरोप के देशों में काम करने वाले तीसरी दुनिया के लोगों का पलायन यूरोप और अमेरिका में होने लगा। इसलिये, जिस अमेरिका में पहले काम के अवसर की भरमार थी, वहां बेरोजगारी दर लगातार बढ़ने लगी। औधोगिक समाज की अवधारणायें अपने आप घूरे से लगती चली गयीं। यह सच भी सामने आ गया, कि सोवियत संघ का पतन पूंजीवादी विश्व की आम जनता और कामगरों के लिये अभिशाप है। तीसरी दुनिया और पहली दुनिया के मजदूर वर्ग को एक दूसरे के खिलाफ खड़ा करके भी लाभ बटोरा जाने लगा।

डेट्रायट के आटो वरकर्स के स्थान पर मैकिसको के आटो वरकर्स को काम पर रखा जाने लगा। फोनीज़ के कस्टमर सर्विसेज वरकर्स के विरूद्ध मुम्बर्इ के कस्टमर सर्विसेज वरकर्स को खड़ कर दिया गया। यही नहीं, तीसरी दुनिया के सस्ते मजदूर एवं कामगरों की वजह से वेतनमान ही बदल दिये गये। न्यूयार्क के विधि सचिव का वेतन फिलिपिंस के ‘ला फोरम’ के विधि सचिव के वेतन के आधार पर तय किया जाने लगा है। अमेरिका के कम्प्यूटर प्रोग्रामर और इंजीनियरों के स्थान पर मास्को और बैंगलोर के कम्प्यूटर प्रोग्रामर और इंजीनियरों को प्रमुखता दी जाने लगी है। अमेरिका के आम लोगों की जिंदगी बद से बदत्तर होती चली गयी। सोवियत संघ और समाजवादी विश्व की मौजूदगी से ही आम अमेरिकी और यूरोपीय देशों की आम जनता के जीवन में समृद्धि थी, सिर्फ राजनीतिक एवं सामाजिक ही नहीं विश्व समाज का आर्थिक संतुलन भी नियंत्रित था।

माक्र्सवाद और उसकी समाजव्यवस्था जिसका प्रतिनिधित्व सोवियत संघ कर रहा था, शोषक देशों की आम जनता के भी हित में था। पूंजीवादी जनतंत्र पर लोक कल्याणकारी राज्य होने का दबाव बना रहता था। किंतु सिथतियां बदल गयीं और अमेरिका में भी आम अमेरिकी कामगरों के स्थान पर दूसरे देशों के आये सस्ते मजदूरों को रखा जाने लगा। 1985 से 2000 के बीच कार्यरत ‘एक्टीव वरकर्स फोर्स’, सक्रीय रूप से काम करने वाले मजदूरों की तादाद 1.5 बिलियन थी, जो 3 बिलियन, दो गुणा से ज्यादा हो गयी। यह घटना पूंजीवाद के इतिहास की अभूतपूर्व घटना थी। समाजवादी देशों में हुए राजनीतिक परिवर्तन एवं प्रतिक्रांति ने भी काम के लिये पलायन की विवशताओं को जन्म दिया। पिछले तीन दशक से कामगरों की सिथतियां रोज-ब-रोज बिगड़ती जा रही हैं। उन्हें कम वेतन पर काम करने के लिये बाध्य किया जाता है। उनकी सुविधाओं में रोज कटौतियां हो रही हैं। उन्हें बुरी सिथतियाें में काम करने के लिये विवश किया गया है। यह विवशता बढ़ती हुर्इ बेरोजगारी दर की वजह से लगातार बढ़ती जा रही है।

1970 के वर्षों में 6,00,000 कामगर ‘जनरल मोटर्स’ में काम करते थे, जिन्हें अच्छा वेतन एवं अच्छी सुविधायें मिलती थीं। मगर आज अमेरिका में सिथतियां पूरी तरह बदल गयी हैं। 1.2 मिलियन कामगर ‘वाल मार्ट’ में काम करते हैं। जिनका वेतन गरीबी की सीमा रेखा पर जीवनयापन करने वालों के बराबर है। ये बड़ी मुशिकल से सरकारी सहायता एवं सरकार के ‘फूड स्टैम्प’ के सहारे जी रहे हैं। जिसमें अमेरिकी मंदी की वजह से कटौतियां की गयी हैं। स्वास्थ्य, चिकित्सा एवं आवासीय कार्यक्रमों में भी भारी कटौतियां की गयी हैं।

अमेरिकी कारपोरेट जगत, बहुराष्ट्रीय कम्पनियों ने पूरी दुनिया में कम से कम वेतन की होड़ सी लगा दी है। जो अमेरिकी कामगर पहले अच्छी वेतन पाते थे, अब उन्हें तीसरी दुनिया के कम वेतन पाने वाले कामगरों के साथ खड़ा कर दिया गया है।

सोवियत संघ और समाजवादी देशों के पतन के बाद लाभ के लिये जिस तरह गरीबी और भूख का वैश्वीकरण हो गया है, वेतन एवं मजदूरी का भी वैश्वीकरण कर दिया गया है। अमेरिका से हो रहे औधोगिक पलायन की मुख्य वजह तीसरी दुनिया के देशाें में कम मजदूरी दर है। अमेरिकी सरकार वैशिवक मंदी से उबरने के लिये वित्तीय इकार्इयों एवं औधोगिक घरानों को बेल आउट पैकेज दी, ताकि उधोगों को संभाला जा सके, लेकिन दुनिया पर आधिपत्य जमाने की उसकी नीति एवं एकाधिकारवादी वैश्वीकरण ने तथा ज्यादा से ज्यादा लाभ कमाने की हवस ने, अमेरिका से उधोगों का पलायन शुरू कर दिया। आज वालमार्ट के ज्यादातर सामान चीन में उत्पादित होते हैं, और यूरोप तथा अमेरिका के बाजारों में बिकते हैं। उधोगों का पलायन हो रहा है और बाजार पर इन कम्पनियों ने अपनी पकड़ पहले से ज्यादा बढ़ा दी है। वालमार्ट के खिलाफ अमेरिका में प्रदर्शन हो रहे हैं। वह तीसरी दुनिया के देशों में अपने पांव पसार रहा है। भारत में वालमार्ट जैसी कम्पनियों के भारी विरोध के बीच, सराकारी स्वीकृति मिल गयी है। जहां प्राकृतिक संसाधन, बड़ा बाजार और मजदूरी दर न्यूनतम है।

आज अमेरिका की सिथति यह है कि बेरोजगारी दर 11 प्रतिशत के ऊपर जा चुका है, और वहां की आम जनता में कारपोरेट जगत, निजीपूंजी, वाल स्ट्रीट के साथ व्हार्इट हाउस और सीनेट के खिलाफ भारी नाराजगी है। सरकारी योजनाओं का ही परिणाम है कि अमेरिका का आम आदमी भूख, गरीबी, बेरोजगारी और आवासहीन होने की सिथतियां झेल रहा है। जिन पर सरकारी कर्ज, कर एवं कटौतियाें के अलावा तीसरी दुनिया के देशों पर थोपे गये युद्ध के खर्च का भारी बोझ है। उसने आतंकवाद के खिलाफ जिन युद्ध और हमलों की शुरूआत की है, उस पर आने वाला खर्च अमेरिका के वित्त व्यवस्था की कमर तोड़ने के लिये काफी है। इस भारी मंदी के दौर में भी उसके रक्षा बजट में भारी वृद्धि की गयी है। यह वृद्धि उस समय की गयी है जब प्रस्तावित ‘फिस्कल किलफ’ विधेयक यदि 31 दिसम्बर को पास नहीं होता तो अमेरिका वैशिवक मंदी के चपेट में दूसरे दिन ही चला जाता।

अमेरिकी सरकार का यह प्रचारित सच रहा है कि ‘सोवियत संघ अमेरिका के लिये सबसे बड़ा खतरा है।’ दुनिया भर में फैले उसके हजार से ज्यादा सैनिक अडडे, महासागरों पर तैरते नवसैनिक बेड़े, दूर तक मार करने वाले आधुनिकतम प्रक्षेपास्त्र से लेकर नाभकीय, जैविक, एवं रसायनिक हथियारों का जखीरा, उसने इसी तर्क के आधार पर जमा किया। हथियारों की होड़ शीतयुद्ध की पहचान रही है। यह पहचान लौट आयी है।

अब सोवियत संघ नहीं है, और लगभग एक दशक तक उसके सामने ऐसी कोर्इ वैशिवक चुनौतियां भी नहीं थीं। शीतयुद्ध की समापित हो चुकी थी, वार्सा संधि के देश बिखर गये थे। मगर, नाटो सैन्य संगठन और पेण्टागन की गतिविधियों में कमी नहीं आयी। हथियार उत्पादन, से लेकर सैन्य क्षमता में विस्तार की योजनायें विस्तार पाती रहीं। सारी दुनिया पर प्रभुत्व कायम करने और उसे अपने वर्चस्व के दायरे में लेने की अमेरिकी कवायतें तेज होती चली गयीं। युद्ध का खतरा पहले से ज्यादा बढ़ गया। युद्ध के वैशिवक खतरे को लगातार बढ़ाया गया।

आज अमेरिकी सैन्य एवं सुरक्षा विभाग -पेण्टागन- अमेरिकी अर्थव्यवस्था के वैश्वीकरण और निजी-वित्तीयपूंजी के विस्तार के लिये, मुक्त बाजारवादी नीतियों को सारी दुनिया पर थोपने वाली अंतर्राष्ट्रीय इकार्इ -विश्व बैंक, अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष, विश्व बाजार संगठन के लिये काम कर रहा है। जो आम लोगों के जीवनस्तर को बद से बदतर बनाने और ज्यादा से ज्यादा लाभ कमाने के लिये न्यूनतम वेतन एवं मजदूरी की सिथतियां सुरक्षित कर रहा है। वह दुनिया के कामगर और श्रमशकित के स्त्रोत को एक-दूसरे के विरूद्ध खड़ा करने में लगा है। उग्र राष्ट्रवाद और नस्लवादी सोच को बढ़त दिलार्इ जा रही है। शीतयुद्ध की समापित की औपचारिक घोषणा के साथ विश्व शांति के जिस वायदे को किया गया था, उन वायदों को तोड़ने की सिथतियां बनार्इ गयी हैं। अमेरिकी साम्राज्य पिछले एक दशक से युद्ध, किसी भी देश के आंतरिक मामले में हस्तक्षेप और भविष्य में होने वाले युद्ध की तैयारी में व्यस्त रहा है। यही कारण है कि उसका सैन्य खर्च लगातार बढ़ता रहा है जिसका सीधा नकारात्मक प्रभाव दुनिया और अमेरिका के कामगारों पर पड़ा है।

आज यदि अमेरिकी साम्राज्यवाद की सूरत बनायें तो उसके चेहरे पर 911 की घटना के बाद इराक, अफगानिस्तान और लीबिया की तबाही का मंजर नजर आयेगा। फांसी के फंदे से झूलते सददाम हुसैन और 16 लाख, 90 हजार, 903 इराकियों की लाशें नजर आयेंगी। 48 हजार, 644 अफगानों के छत्त-विक्षत शव नजर आयेंगे। गोलियों से छलनी कर्नल गददाफी और हजारों-हजार मारे गये लीबियार्इयों के साथ तबाह लीबिया नजर आयेगा। जो सिर्फ इसलिये मारे गये कि वो अमेरिकी साम्राज्यवाद और अमेरिकी वर्चस्व के खिलाफ थे। गैर पूंजीवादी विश्व के पक्षधर और पूर्व सोवियत संघ के मित्र देश थे।

आज भी अमेरिकी साम्राज्यवाद के निशाने पर लातिनी अमेरिकी देश- क्यूबा, वेनेजुएला और महाद्वीप के समाजवादी देश हैं। जो नवउदारवादी वैश्वीकरण, मुक्त बाजारवाद और एकधु्रवी अमेरिकी विश्व के विरूद्ध बहुध्रुवी विश्व की अवधारणा से संचालित हो रहे हैं। जिन्होंने सहयेाग एवं समर्थन की वित्तीय एवं राजनीतिक प्रणाली का विकास किया है। विकास के जरिये समाजवादी जनतंत्र की सोच को विकसित किया है। अमेरिकी साम्राज्यवाद के निशाने पर सीरिया और र्इरान है। जिनके खिलाफ मीडियावार की शुरूआत हो गयी है और तीसरे विश्वयुद्ध की पृष्टभूमि भी बन चुकी है। 2013 में सीरिया के ध्वंस और 2014 में र्इरान पर आधिपत्य जमाने की अमेरिकी योजना है। रूस और चीन की बढ़ती निकटता अमेरिकी साम्राज्यवाद की सबसे बड़ी समस्या है। रूस की सामरिक शकित और चीन की वित्तीय सिथति उसके लिये बड़ी चुनौती है। जो बहुध्रुवी विश्व और अमेरिकी एकाधिकार के खिलाफ है। अमेरिका यह मान कर चल रहा है कि आने वाला कल एक बड़े युद्ध का है।

पेण्टागन ने अपने -न्यूकिलयर वेपन्स- परमाणु हथियार -‘न्यूकिलयर बंकर ब्लास्टर’- का नवीनीकरण कर रहा है। उसने हार्इटेकिनक सर्विलांस सिस्टम विकसित किया है। अमेरिका ने पूर्वी यूरोप, अलास्का और प्रशांत क्षेत्र में एंटी मिसाइल्स सिस्टम का निर्माण कर नये मिसार्इल शिप विकसित कर रहा है। आधुनिकतम एयरक्राफ्ट और अपने स्पेश वारफेयर की क्षमता को बढ़ाने के लिये उस पर लगातार खर्च कर रहा है। यह तैयारियां भविष्य में होने वाले युद्ध और दुनिया की बदलती सिथतियों को देखते हुए की जा रही हैं। सैन्य क्षमता को बढ़ाने के लिये किया जाने वाला यह खर्च रूस, चीन, र्इरान को घेरने के साथ-साथ पूरी दुनिया को अपने हथियारों की जद में लेना है। अमेरिका ने अपना चौथा बेड़ा- कैरेबियन सी में तैनात कर रखा है। इसके अलावा सभी तरह के ड्रोन, एक्सप्लोसिव प्रूफ आरमर्ड वैकिल्स और अन्य घातक हथियारों के निर्माण का काम भी अपने चरम पर पहुंच गया है। यह सब तब हो रहा है, जब वैशिवक मंदी का भयानक दौर चल रहा है, उसकी अपनी घरेलू अर्थव्यवस्था संगठनग्रस्त है और जनअसंतोष बढ़ता जा रहा है। इन सब बातों में गौर करने वाली बात यह है कि सरकार द्वारा खर्च की जाने वाली विशाल धनराशि अमेरिका के बड़े हथियार उत्पादक निजी औधोगिक घरानों के जेब में जाता है, जिनसे आम अमेरिकी भी अब घृणां करने लगा है।

site_1_rand_414647686_saddam_statue_tied_b_gettyनिजी कम्पनियों और कारपोरेशनों पर आधारित अमेरिका का हथियार उधोग पूरी तरह अमानवीय है। लोगों को अमेरिका की निजी सेना में भर्ती करने के लिये बड़े-बड़े ‘प्रार्इवेट मिलिट्री कारपोरेशन’ युवाओं को और छात्रों को, एजुकेशन फण्ड -पढ़ार्इ के खर्च के लिये कर्ज- और केरियर बनाने का आश्वासन दे कर, अपने जाल में फंसाते हैं। न्यूनतम वेतन पाने वाले अमेरिकी भी उनके जाल में फंस जाते हैं। पूंजीवादी वित्तव्यवस्था की आर्थिक अनिश्चयता और बाजारवादी नीतियों से तंगहाल लोग भी इन कारपोरेशनों का शिकार हो जाते हैं। अमेरिका में काम के लिये तीसरी दुनिया के देशों से आये लोगों को ‘ग्रीन कार्ड’ दिलाने का आश्वासन दे कर भी उन्हें निजी सेना में भर्ती कर लिया जाता है। लोगों को मारने और मरने का व्यापार तेजी से फैला है। निजी सेना की बढ़ती हुर्इ मांग का प्रभाव वहां की समाज व्यवस्था पर भी पड़ा है, जहां हिंसा और अपराध को खुली छूट मिल गयी है। निजी सेनायें आम अमेरिकी को हत्यारा बना रही हैं। इराक और अफगानिस्तान में इनके द्वारा की गयी कार्यवाही और अमेरिकी सेना को की गयी, इनके मदद को, मानवाधिकार की सीमाओं का उल्लंघन के रूप में देखा जाता है, जिन पर किसी भी अंतर्राष्ट्रीय कानून की कोर्इ बंदिशें नहीं हैं। इनके कारनामों का उल्लेख कर्इ मानवाधिकार संगठनों ने भी किया है। राष्ट्रसंघ के द्वारा भी गहरी चिंता व्यक्त की गयी है। ये अमानवीय, नृ:संश, पेशेवर हत्यारों की तरह काम करते हैं।

आम अमेरिकी -वालस्ट्रीट मोमेण्ट से जुड़े लोग- व्हार्इट हाउस, सीनेट और वाल स्ट्रीट को आतंकवादी मानते हैं। आज इस्लामी आतंकवादी संगठनों को अमेरिकी संरक्षण प्राप्त है, वो अमेरिकी हितों के लिये सीरियार्इ विद्रोहियों के साथ है और लीबिया में उन्होंने ही टीएनसी विद्रोहियों का नेतृत्व किया। लीबिया की मौजूदा सरकार इन्हीं सशस्त्र गुटों की सरकार है। जो आपस में लड़ रहे हैं। इस बात के सैंकड़ों प्रमाण हैं कि एशिया और अफ्रीका में आतंकी गुट अमेरिकी हितों के लिये काम कर रहे हैं। वे पेशेवर विद्रोही की भूमिका निभा रहे हैं। वैशिवक संकट और विश्व शांति के लिये जहां भी खतरा है, वहां अमेरिकी साम्राज्यवाद की गहरी सम्बद्धता है।

25 दिसम्बर 1991 में सोवियत संघ का विघटन हुआ और मार्च 1992 में ‘डिफेन्स प्लानिंग गार्इडेन्स’ को अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति जार्ज बुश ने स्वीकृति दी। ‘इंटरनल डिपार्टमेण्ट आफ डिफेन्स’ का एक दस्तावेज सामने आ गया है जिसमें अमेरिकी साम्राज्यवाद की मंसा का खुलासा हुआ है। कि ”वह दुनिया में अमेरिकी साम्राज्य को एकमात्र शकित के रूप में स्थापित करना चाहता है।” ऐसी सिथतियां बनाना चाहता है कि ”दूसरी कोर्इ शकित या संगठित ताकत उसे चुनौती देने की बात तक नहीं सोच सके।” इस दस्तावेज को उस समय के सेक्रेटरी आफ डिफेन्स डेस्क के चीफ के डिप्यूटी पाल वोल्फविटज ने लिखा है। 21वीं सदी को अमेरिकी सदी में बदलने की सोच का यही आधार है, जिसका मतलब है वैश्वीकरण। आज विश्व के सामने वैशिवक मंदी से लेकर विश्व शांति के लिये जितनी भी समस्यायें एवं खतरे हैं उनमें से 90 प्रतिशत से ज्यादा की वजह अमेरिकी साम्राज्यवाद है। उसने ही मौजूदा सदी को ऐसी सदी में बदलने की योजना बनार्इ है जहां उसका एकाधिकार हो। सोवियत संघ एवं दुनिया के सामाजवादी देशों के पतन ने उसे बेलगाम कर दिया है।

अपने को महान और महानतम बनाने की उसकी योजना जन्म के साथ ही विकृत और विकलांग है। दुनिया को अपने जेब में रखने की उसकी कोशिशें नाकाम होती जा रही हैं। ऐसे समिकरण और संगठनों का उदय हो चुका है जो एकाधिकारवाद के खिलाफ है। यह ठीक है कि रूस से लेनिन की प्रतिमायें हटार्इ जा रही हैं, मगर उसकी अंतर्राष्ट्रीय नीति में पूर्व सोवियत संघ की ओर लौटने की अनिवार्यतायें साफ नजर आने लगी हैं। चीन वित्तीय शकित के रूप में उभर चुका है और संक्रमण कालीन अमेरिकी व्यवस्था पतनशील है। लातिनी अमेरिका में 21वीं सदी के समाजवाद का जन्म हो गया है और माक्र्सवाद की प्रासंगिकता पहले से ज्यादा बढ़ गयी है। सोवियत संघ के विघटन के बाद की दुनिया में नये समिकरण की अनिवार्यता रोज बढ़ती जा रही है।

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