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हिमांशु बी. जोशी की तीन कविताएं

1. रंगHimanshu Joshi

दुनिया के रंग
रंगों की दुनिया
सब तरफ रंग
उद्दाम, अनगिनत, अनंत रंग
शब्दों में रंग, अर्थाें में रंग
कविता-नाटक में रंग
जैसे इच्छा और उम्मीद का रंग
वैसे ही बनावट और आकार का रंग.

क्लर्क की नीली स्याही से लिखे हरे नोट पर
बड़े साहब की टिप्पणी का दर्पीला लाल रंग
नेताओं के झक सफेद कुर्ते का क्रूर रंग
रैम्प पर कैटवाॅक करती बाला का शोख रंग
आतंकवादी की बंदूक से निकली गोली का स्याह रंग
मजदूर की मेहनत और पसीने में बहता बेबसी का रंग
बहुसंख्यक संवेदना पर थोपा जाता भक्ति का भगवा रंग!

एक रंग खुसरो का एक रंग का है कबीर
रंगों में ही अभिनय करते हैं अमिताभ और नसीर
एक रंग है कवि नेरूदा और फैज़ का
एक ही रंग है भरतनाट्यम और जैज़ का
रंगों से सराबोर करता है सचिन-लारा का चैका
रंगों को कह सकते हैं जीवन या आंख का धोखा

जैसे सात रंगों के संयोजन से
बनता है एक इन्द्रधनुष
हज़ारों हज़ार दृश्य-अदृश्य रंगों के अनगिनत कोलाजों से
रोज़ बनती है यह दुनिया!

 

2. बाज़ार में…

यदि जीवन के लिए
कच्चा माल वाहक है पिता
तो मां एक मशीन है किण्वन पात्रा है
जिसमें होता है उसका उत्पादन

एक नियत ताप, नियत दाब पर
निर्धारित अवयवों-उत्प्रेरकों के साथ
लगभग नौ महिने चलती है एक रासायनिक प्रक्रिया
एक अनाम व अदृश्य सी ऊर्जा धीरे-धीरे इस पूरी अवधि में
जोड़ती है हड्डियों पर हड्डियां
लगाती है मांस, मज्जा
बिछाती है जाल धमनियों का
सजाती है कम से कम पाॅंच इंद्रियों से उसे
हालांकि कहा जाता है एक छठी इंद्रीय भी होती है कहीं
जो देख सकती है अदृश्य को या बता सकती है भवितव्य

इस तरह एक अदद शरीर बनता है और फिर
उसमें मन और मस्तिष्क के अशरीरी खाने बनते हैं
भरे जाते हैं जिनमें सुख-दुख संवेदना और ज्ञान के तन्तु

उपरोक्त प्रक्रिया से उत्पन्न हुआ उत्पाद
हर संभव निर्भर करता है अपने मां और पिता के गुणों पर
उसके नाक-नक्श भी बहुत हद तक उनसे ही मिलते जुलते होते हैं
हाव-भाव भी वह उन्हीं की तरह करता पाया जाता है
बोलते हुए भी उसकी आवाज़ में उनकी सी खनक सुनी जा सकती है
फिर भी बावजूद इसके वह अपने मां-बाप की पूरी कार्बन काॅपी नहीं होता
उसके अन्दर उनसे अलग कुछ और भी रहता है
जिसे उभारकर गुरु और मित्र एक दिशा देते हैं
करते हैं उसे संतुलित-आश्वासित-प्रेरित
बनाते हैं विशिष्ट-विशिष्टतम्
अपनी तरह का यूनीक

जैसे-जैसे समय दौड़ता है अपनी नियत गति से
परत दर परत उस पर चढ़ती जाती है
समाज के नैतिक मूल्यों के साथ-साथ
भाषा-जाति-धर्म-लिंग-पूर्व-पश्चिम वाली
सभ्यता-संस्कृति की एक सनातन और चमकदार लिपटन

संभव है जीवनचक्र की इस रासायनिक प्रक्रिया के बारे में
कविता लिखना अनैतिक कहा जाए
और यह भी संभव है इसे कविता माना ही न जाए
लेकिन जो भी हो
आज सबकी नज़र सिर्फ इस बात पर है कि
किस तरह गुणों से भरपूर जीवन
बनता, सजता, संवरता है
और कई तरह की लिपटनों में लिपट
प्रस्तुत होता है ‘बाज़ार’ में जाने के लिए!

बाज़ार में किसके क्या दाम लगाये जायेंगे
मुश्किल है कहना!

 

3. सबसे सुंदर?

कट्टरों के देश में
किसी विचार-संवाद के लिए नहीं होती जगह
जिन्हें ज़हर बांटना होता है उन्हें इंसानियत से क्या काम ?

कट्टरों के देश में
मर्द मर्द होता है, औरत औरत
जो मर्द औरत की बेहतरी की सोचे, कहलाये नपुंसक !
और जो औरत मर्द के लिए दुआ करे, हो जाये बदनाम!

कट्टरों के देश में
हालाँकि तमाम ज़रूरी चीज़ों के दाम छू रहे हैं आसमान
यहां उछल रहे हैं ‘लव जेहाद’ जैसे जुमले
और कर भी क्या सकते हैं-
राम ने सूर्पनखा का नाक कटवा दिया था
प्रेम करने की सज़ा !
ये तो उससे कम ही है…….

कट्टरों के देश में
काश कि सारे मजहबों के ताकतवर मर्द
पहने एक दिन के लिए साड़ी, सलवार, बुरका,
भरें मांग, निहारें खुद को शीशे में और प्यार से पूछें –
‘दर्पण, दर्पण, बता ज़रा-कौन है हम में सबसे संुदर?’

तब दर्पण
किस का पक्ष लेगा?
या फिर दोहराएगा इतिहास
कट्टरों के देश में….

-हिमांशु बी जोशी

 

कवि परिचयः
पिछले 20 वर्षों से राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से जुड़े कवि, रंगकर्मी हिमांशु बी. जोशी ने सलमान रुश्दी के ‘मिडनाइट्स चिल्ड्रन’ का नाट्य रूपान्तरण, शमा फुतेहाली के ‘ताजमहल’ का अनुवाद, भारत में पहली बार हुई रंगमंच-सर्कस प्रस्तुति ‘क्लाउन्स एंड क्लाउड्स’ का सह-लेखन, तथा ‘मेमसाब पृथ्वी’ व ‘हाॅं, मैं गीत बेचता हूं’ (हिन्दी के जाने माने कवि स्व. भवानीप्रसाद मिश्र के जीवन व कृतित्व पर) आदि नाटक लिखे हैं। बच्चों के लिए आपने ‘इक्कीसवीं सदी की दादी’ और ‘मंगल ग्रह का रहस्य’ नाटकों का लेखन व निर्देशन किया है। आपने जी. शंकर पिल्लई के ‘खोज’, ख्वाजा अहमद अब्बास के ‘बंबई के फुटपाथ पर एक हज़ार रातें’, और शेक्सपियर के ‘रोमियो और जूलियट’ के अलावा सिखों के छठे गुरू श्री हरिकिशन साहिब के वचनों पर आधारित एक विशाल ध्वनि व प्रकाश प्रस्तुति ‘ऐसा गुर बढ़ भागी पाया’ का भी निर्देशन किया है। साहित्य कला परिषद के युवा महोत्सव-1998 के लिए आपने ‘चने’ तथा युवा नाट्य समारोह-2014 के लिए भीष्म साहनी के ‘हानूश’ नाटक का निर्देशन किया। लेखक व निर्देशक के अतिरिक्त आप एक प्रकाश परिकल्पक के रूप में भी बहुप्रशंसित हैं और देश के कई महत्वपूर्ण निर्देशकों के नाटकों की प्रकाश परिकल्पना कर चुके हैं। रानावि की पत्रिका रंगप्रसंग के लिए आपने कई लेख लिखे व अनुवाद किए हैं। आपकी कविताएं आलोचना, कथन, साक्षात्कार एवं जनसत्ता जैसी प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में छप चुकीं हैं। नाट्य प्रस्तुतिकरण हेतु भारत के विभिन्न स्थानों के अलावा आप जापान व इंग्लैंड की यात्रा कर चुके हैं। संस्कृति मंत्रालय भारत सरकार ने आपको 1998-99 में ‘भारतीय रंगमंच में रंगों का मनोविज्ञान’ विषय पर कनिष्ठ शोधवृत्ति तथा 2011-12 में ‘चेंजिंग आॅप्टिक्स इन मल्टीकल्चरल थिएटर’ विषय पर वरिष्ठ शोधवृत्ति प्रदान की। वर्तमान में आप एक स्वतंत्र रंगकर्मी के तौर पर देश भर में कार्य कर रहे हैं।

सम्पर्क:
टी-5, सूर्या अपार्टमेंट,
ई-179, पांडव नगर,
मयूर विहार फेज़-1, दिल्ली-110091
ई-मेल: hbjoshi2k@gmail.com

प्रस्तुति: नित्यानंद गायेन

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