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भू-राजनीतिक संतुलन और निकारागुआ नहर

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निकारागुआ नहर का निर्माण यूरोशिया, उत्तरी अमेरिका, यूरोप, अफ्रीका और लातिनी अमेरिका के भू-राजनीतिक संतुलन के केंद्र में आ गया है। जिससे सम्बद्ध देशों के हितों का प्रभावित होना तय है। यही कारण है, कि इस नहर के निर्माण कार्य से यदि संयुक्त राज्य अमेरिका और यूरोपीय देशों में अपने हितों के लिये बेचैनी है, तो चीन, रूस और लातिनी अमेरिकी देशों में अपने हितों के लिये सुरक्षा एवं विकास की नयी संभावनायें बना रहे हैं। जिससे विश्व भू-राजनीतिक संतुलन भी प्रभावित होगा। जो अमेरिका और यूरोप के विरूद्ध चीन, रूस और लातिनी अमेरिकी देशों के हित में है।

यह भू-राजनीतिक संतुलन के लिये पूर्व सोवियत संघ की नीतियों की ओर रूस का लौटना ही नही है, बल्कि अमेरिका के लिये उन्हीं चुनौतियों के सामने खड़ा होना भी है, जिसके बारे में उसकी सोच और नीतियां चुनौतियों को ध्वस्त करने की है। जिससे दुनिया के कई राजनीतिक मुद्दे जुड़ गये हैं। जिससे भौगोलिक संतुलन की नयी स्थितियां पैदा हो गयी हैं।

यदि रूस और चीन की वर्तमान वैश्विक नीतियों को देखा जाये तो इस समझ से जुड़ना आसान होगा, कि दोनों की नीतियां वार्ता की एक ही मेज पर तय हो रही है, जिसमें यूरेशिया और लातिनी अमेरिकी देशों की भूमिका महत्वपूर्ण है। एक सीमा तक दोनों देशों की राष्ट्रीय हितों में भी गहरी समानता आ गयी है। यदि चीन आर्थिक सुरक्षा और जरूरतांे को सुनिश्चित कर रहा है, तो रूस सामरिक सुरक्षा और कूटनीतिक सम्बंधों को सुरक्षित करने की नीति से संचालित हो रहा है।
अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के लिये रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ही नहीं, चीन के राष्ट्रपति शि-जिन पिंग भी बड़ी चुनौती है। वो पोकर खेल कर थक रहे हैं, जबकि पुतिन शतरंज के खिलाड़ी हैं। यह बताना या तय करना मुश्किल है, कि पुतिन और शि-जिन पिंग में वजीर और बादशाह कौन है? क्योंकि शतरंज के खेल में प्यादे को वजीर बनाने का हुनर पुतिन को आता है और साम्राज्य की सुरक्षा के लिये हर एक गोटी का अपना महत्व है। जबकि अमेरिकी वर्चस्व और एकाधिकार प्यादों का साम्राज्य है।

चीन निकारागुआ नहर निर्माण को लेकर गंभीर वित्तीय चालें चल चुका है, जिसकी कूटनीतिक सुरक्षा से रूस और लातिनी अमेरिकी देशों का हित जुड़ा है।
‘चाईना इन्स्टीच्यूट आॅफ इण्टरनेशनल स्टडीज‘ (सीआईआईएस) के एक वरिष्ठ शोधकर्ता का मानना है, कि ‘‘यदि रूस निकारागुआ नहर निर्माण के दौरान सुरक्षा की समूचित व्यवस्था उपलब्ध कराता है, तो उसे रणनीतिक एवं आर्थिक लाभ मिल सकता है।‘‘ सीआईआईएस सेंटर फाॅर शंघाई को-आॅपरेशन आॅर्गनाइजेशन स्टडीज के सेक्रेटरी जनरल चेन योराॅन्ग ने कहा- ‘‘यहां आर्थिक कारण भी काम कर रहे हैं, लेकिन सुरक्षा के कारण कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण हैं।‘‘ उन्होंने कहा- ‘‘भू-राजनीतिक दृष्टिकोंण से सबसे पहली बात तो यह है, कि अमेरिकी सेना के द्वारा रूस की सीमा के करीब अपनी सैन्य उपस्थिति को बढ़ो की वजह से यह स्वाभाविक है, कि रूस लातिन अमेरिका में अपनी सैन्य उपस्थिति को मजबूत करने के बारे में सोचेगा।‘‘ जिससे चीन का हित भी प्रभावित होता है, क्योंकि अमेरिका एशिया प्रशांत क्षेत्र और चीन सागर में भी अपनी सैन्य उपस्थिति बढ़ा कर चीन के बढ़ते प्रभाव और चीन के व्यापार को नियंत्रित करने के लिये उसके जल मार्गों की सैन्य नाकेबंदी भी कर रहा है।

मुक्त व्यापार के नये क्षेत्रों की रचना करने में दोनों देश बराबर के साझेदार हैं, इसलिये चीन की सैन्य नाकेबंदी और रूस के सीमा के करीब सैन्य उपस्थिति से दोनों ही देशों के लिये समान अमेरिकी खतरा है। जिसके साथ नाटो सैन्य संगठन के सदस्य देश भी हैं। इसलिये माना यही जा रहा है, कि निकारागुआ नहर की सुरक्षा के लिये रूस की पहल को चीन का समर्थन है। वैसे भी, ब्रिक्स देशों के ब्राजील सम्मेलन से पहले, दौरान और बाद में रूस के राष्ट्रपति पुतिन और चीन के राष्ट्रपति शि-जिनपिंग ने जिस तरह लातिनी अमेरिकी देशों की यात्रा की, और बाद में जो परिणाम हमारे सामने आ रहे हैं, उससे इस बात को बल मिलता है, कि निकारागुआ नहर निर्माण से रूस का हित चीन से जुड़ा हुआ है।

वैसे, चीन के एक अन्य शोधकर्ता की राय इससे भिन्न है। जो जेगसांग इण्टरनेशनल स्टडीज यूनिव्हरसीटी (ज़डआईएसयू) के हैं, ने स्पुतनिक से कहा कि ‘‘नहर का निर्माण निकारागुआ का आतंरिक मामला है, और उसमें किसी भी तरह का अंतर्राष्ट्रीय हंस्तक्षेप अनुचित है।‘‘ ‘जेडआईएसयू इन्टीच्यूट आॅफ लैटिन अमेरिकीन स्टडीज‘ के डिप्टी डाॅयरेक्टर जांग-जुंग ने कहा है, कि ‘‘रूस पश्चिमी गोलार्ध में अपनी उपस्थिति मजबूत करना चाहता है, जिसकी वजह से उसका अमेरिका के साथ संघर्ष है, और लातिनी अमेरिका में भी तनाव बढ़ सकता है।‘‘ उन्होंने कहा- ‘‘हमें क्यूबा के मिसाइल संकट को नहीं भूलना चाहिये, इसलिये अच्छा यही होगा, कि रूस निकारागुआ नहर के बारे में भूल जाये।‘‘

यह निष्कर्ष अपने आप में गलत दिशा की ओर चलने का परिणाम है। लातिनी अमेरिकी देशों को अमेरिकी बैकयार्ड (पिछवाडा) समझने वाले संयुक्त राज्य अमेरिका केे रहते निकारागुआ नहर के निर्माण को -जिसमें चीन का वित्तीय सहयोग है- इसे निकारागुआ का सिर्फ आतंरिक मामला समझना और यह मान लेना कि निकारागुआ नहर के निर्माण के लिये रूस और अमेरिका के बीच का संघर्ष ही ‘सुरक्षा के लिये खतरा है‘ गलत है। और यह सलाह देना कि ‘‘रूस इससे अलग रहे‘‘ तो संघर्ष टल सकता है, या सुरक्षा सुनिश्चित हो सकती है, अपने आप में बड़ी भूल है। यह सोचने का कोई आधार नहीं है, कि अमेरिकी सरकार अपने हितों की अनदेखी कर निकारागुआ और लातिनी अमेरिकी देशों के विकास के पक्ष में खड़ी होगी और उस क्षेत्र में चीन की वित्तीय बढ़त को स्वीकार करेगी। वह इस बात को स्वीकार करेगी कि पनामा नहर का महत्व घट जाये, जिसके माध्यम से वह लातिनी अमेरिकी देशों पर व्यापारिक नियंत्रण रखता है।

पिछले महीने रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लोवारोव ने एक टेलिविजन इण्टरव्यू में कहा था, कि ‘‘मास्को निकारागुआ के अंतर्महाद्वीपीय दो महासागरों को जोड़ने वाली नहर के निमार्ण स्थल की सुरक्षा के लिये सहयोग देने को तैयार है।‘‘ उन्होंने यह बात मध्य अमेरिका की यात्रा से पहले कहा था। उन्होंने यह भी कहा था, कि ‘‘रूस के संभावित सहयोग देने के बारे में अभी दोनों देशों के बीच वार्ता नहीं हुई है।‘‘

अमेरिकी मीडिया इस बात का प्रचार कर रही है, कि रूस निकारागुआ को फाइटर जेट -लड़ाकू बम वर्षक- बेचने की योजना बना रहा है। उसने दक्षिण अमेरिका में रूस की बढ़ती मौजूदगी के प्रति अपनी चिंता भी जाहिर किया है।

चेन योराॅन्ग ने कहा है, कि ‘‘रूस के द्वारा लातिनी अमेरिकी देशों के साथ अपने सहयोग एवं सम्बंधों को मजबूत करने की कोई भी योजना नाटो द्वारा पूर्वी यूरोप में अपनी मौजूदगी बढ़ाने की प्रतिक्रिया होगी।‘‘ उन्होंने आगे कहा कि ‘‘रूसी सेना के द्वारा लातिनी अमेरिका में अपने सैन्य उपस्थिति बढ़ाना नाटो संगठन के द्वारा रूस की सीमा के करीब अपनी सैन्य उपस्थिति बढ़ाने की नीति से जुड़ा है। पिछले साल नाटो ने पूर्वी यूरोप में बैलेस्टिक मिसाइल डिफेंस कम्पोनेन्ट स्थापित किया, सैन्य युद्धाभ्यास किये, बाल्टिक देशों में अपनी सेना की स्थिति को मजबूत किये हैं, जिसे रूस अपनी सुरक्षा के लिये खतरा मानता है।‘‘ अमेरिका और नाटो की नीति बाल्टिक क्षेत्र में रूस के विरूद्ध वर्चस्व स्थापित करना है।

मार्च में रूस के विदेशमंत्री ने कोलम्बिया, ग्वाटेमाला और क्यूबा की यात्रा की। जिसके बारे में अमेरिकी कांग्रेस की एलीना रोज ने कहा- ‘‘यह यात्रा इस क्षेत्र में अपने विशेष प्रभाव को बढ़ाने के लिये एक खेल की तरह है।‘‘ फरवरी में ही रूस और निकारागुआ रूसी युद्धपोत को निकारागुआ के बंदरगाह पर रूकने और ईधन तथा जरूरत पड़ने पर आवश्यक मरम्मत के समझौते पर हस्ताक्षर किया था। वैसे भी निकारागुआ लातिनी अमेरिकी देशों में क्यूबा की तरह पूर्व सोवियत संघ का मित्र देश रहा है। अमेरिकी सरकार यह मान कर चल रही है, कि रूस के राष्ट्रपति पुतिन पूर्व सोवियत संघ के गौरव की पुर्नस्थापना करने में लगे हैं।

0310-panama-canal-constructionनिकारागुआ नहर निर्माण परियोजना की शुरूआत 22 दिसम्बर 2014 में हुई थी। 50 बिलियन डाॅलर की लागत से बनाया जा रहा यह नहर अटलांटिक महासागर और प्रशांत महासागर को जोड़ने के लिये है, जिसका निर्माण कार्य ‘हांग-कांग निकारागुआ कैनाल डव्लपमेंट ग्रूप‘- निजी कम्पनी- को दिया गया है, जिस पर नहर को 5 साल में पूरा करने की जिम्मेदारी है। जिसमें चीन की बड़ी हिस्सेदारी है।

इस अंर्तमहासागरीय नहर निर्माण परियोजना के शुरू होने से परिश्चमी देशों की विसंगतियां उभर आयी हैं। अमेरिका को इस बात डर है, कि इस नये अंर्तमहासागरीय नहर की वजह से जिस नये समुद्री मार्ग का निर्माण होगा वह दक्षिण अमेरिका और पश्चिमी गोलार्ध में अमेरिका के भू-राजनीतिक स्थिति को कमजोर बना देगा।

विशेषज्ञों का मानना है, कि ‘‘निकारागुआ नहर को अंर्तमहासागरीय व्यापार बिल्कुल बदल जायेगा। एशिया और दक्षिण अमेरिका के सम्बंध मजबूत होंगे। चीन, जापान, दक्षिण कोरिया, वेनेजुएला, ब्राजील, अर्जेन्टीना और रूस को फायदा मिलेगा, दूसरी ओर अमेरिका, पनामा और मैक्सिको के हितों में गिरावट आयेगी, उनका महत्व घट सकता है।‘‘ यह एक ऐसी सच्चाई है जिसे अस्विकार नहीं किया जा सकता, किंतु किसी भी क्षेत्र के विकास को अमेरिका और पश्चिमी हितों से जोड़ कर देखने के अमेरिकी नीति को भी स्वीकार नहीं किया जा सकता।

इस नहर के निर्माण की योजना नयी नहीं है। ऐसी अनिवार्यता शताब्दी भर पहले से महसूस की जाती रही है, किंतु 1904 से ही अमेरिका प्रशांत और अटलांटिक महासागर के बीच के सभी अंर्तमहासागरीय सम्बंधों को नियंत्रित करता आ रहा है। 1912 से 1933 के दौरान अमेरिकी सेना ने निकारागुआ पर कब्जा कर लिया और दूसरे देशो को अंर्तमहासागरीय नहर बनाने से रोक दिया, ताकि अमेरिकी वर्चस्व वाले पनामा नहर का कोई विकल्प नहीं बन सके। हालांकि 1999 दिसम्बर में अमेरिका को पनामा नहर पनामा को सौंपना पड़ा, यहां तक कि सभी अमेरिकी सैन्य साज-ओ-सामान पर भी पनामा का वर्चस्व कायम हो गया, किंतु सही अर्थों में वह क्षेत्र आज भी अमेरिकी निगरानी में है। जहां से वह दोनों महासागरीय क्षेत्र के देशों के व्यापार को नियंत्रित करता है, तथा अपने सामरिक हितों को सुरक्षित रखता है। पनामा नहर एशिया और लातिनी अमेरिकी एवं कैरेबियन देशों के बीच का ऐसा द्वार है, जिस पर अमेरिका का अधिकार है। निकारागुआ नहर इसी वर्चस्व को तोड़ देगा।

निकारागुआ की राजधानी मानागुआ में स्थित अमेरिकी दूतावास ने जनवरी 2015 में अपने एक अधिकारिक वक्तव्य में कहा था, कि- ‘‘अमेरिकी दूतावास इस नहर निर्माण परियोजना के कई महत्वपूर्ण बिंदुओं पर चिंतित है। जिसमें सही जानकारी की कमी और पारदर्शिता का अभाव जैसे मुद्दे हैं। जो पहले भी थे और आज भी हैं।‘‘ दूतावास ने अपने वक्तव्य में कहा कि ‘‘हम मांग करते हैं, कि इस परियोजना के सभी पहलू -जिसमें वित्तीय सहयोग, परियोजना के औचित्य और पर्यावरण की स्थिति जैसे मुद्दे हैं, उन्हें स्पष्ट किया जाये, ताकि निर्माण में हिस्सा ले रही अमेरिकी एवं अन्य देशों की कन्स्ट्रक्शन कम्पनियों के लिये प्रक्रिया और सम्पत्ति के मुद्दे को हल करने की कार्यप्रणाली और अन्य संभवनाओं को खुले और पारदर्शितापूर्ण पद्धति से हल किया जा सके।‘‘

विश्लेषकों के अनुसार- ‘‘निकारागुआ नहर निर्माण परियोजना जहां चीन और रूस की स्थिति को उस क्षेत्र में मजबूत करेगा, वहीं दूसरी तरह अमेरिकी हितों के लिये नये खतरों को पैदा करेगा। और यह खतरा सिर्फ आर्थिक ही नहीं, बल्कि राजनीतिक भी होगा। इस नहर के निर्माण से पश्चिमी गोलार्ध में अमेरिकी वर्चस्व में गिरावट आयेगी। उसके वर्चस्व का दायरा घट जायेगा।‘‘

अमेरिकी हितों के प्रभावित होने, और वर्चस्व के घटने की निश्चित आशंकाओं से अमेरिकी नीतियां संचालित हो रही हैं। इस बात की आशंकायें बनी हुई हैं, कि अमेरिकी सरकार पर्यावरा और भू-अधिग्रहण के मुद्दों के तहत निकारागुआ के स्थानीय लोग और दक्षिण पंथी ताकतों को सहयोग दे कर, वहां राजनीतिक अस्थिरता पैदा कर सकता है। आशंका इस बात की है, कि निकारागुआ की वामपंथी सरकार को सत्ता से बे-दखल करने की कवायतें भी शुरू हो सकती हैं, ताकि नहर निर्माण परियोजना को स्थगित किया जा सके।

इसलिये नहर निर्माण स्थल की सुरक्षा के साथ निकारागुआ को कूटनीतिक एवं सामरिक सहयोग एवं समर्थन की भी जरूरत है। जिसे रूस ही उपलब्ध कराने की स्थिति में है। वैसे भी निकारागुआ पूर्व सोवियत संघ का निकटतम मित्र देश था, यही कारण है, कि रूस से भी उसके निकटतम सम्बंध हैं। 2007 में निकारागुआ और रूसी संघ के बीच के रिश्तों में काफी विकास हुआ है। राष्ट्रपति जोश डेनियल ओरटेगा की सरकार ने मास्को से अपने सम्बंधों को वरियता दी है। इसलिये यह सोचने का ठोस आधार है कि चीन के वित्तीय सहयोग से निर्माणाधीन नहर में रूस की गहरी सम्बद्धता है। मास्को और मानागुआ के रिश्तों आपसी हितों की समझदारी है। रूस 1 लाख टन गेहूं हर साल निकारागुआ को उपलब्ध कराता है, और उस क्षेत्र में नशीले पदार्थों की तस्करी के विरूद्ध जारी अभियान में दोनों देशों की द्विपक्षीय साझेदारी है। सितम्बर 2014 मे 45 निकारागुआ सैन्य अधिकारी सर्वोच्च सैन्य प्रशिक्षण के लिये रूस गये थे। रूस निकारागुआ की सेना का प्रमुख सहयोगी देश है। वर्तमान में रूस पूर्व सोवियत संघ के, लातिनी अमेरिका और कैरेबियन देशों में, क्यूबा, वेनेजुएला और अन्य देशों के साथ अपने राजनीतिक-रणनीतिक और आर्थिक सम्बंधों को मजबूत कर रहा है।

पिछले महीने बोगोटो में एक प्रेस कांफ्रेन्स में रूस के विदेश मंत्री सर्गेयी लोवारोव ने जोर देकर कहा था, कि ‘‘रूस ‘यूरेशियन इकोनाॅमिक यूनियन‘ और लातिनी अमेरिका के ‘यूनियन आॅफ साउथ अमेरिकन नेशन्स‘ कम्युनिटी आॅफ लैटिन अमेरिकन एण्ड कैरेबियन स्टेट्स और अन्य संगठनों के बीच की एकजुटता और एकीकरण का स्वागत करेगा।‘‘

राष्ट्रसंघ में क्रिमिया के मुद्दे पर (रूसी संघ में क्रिमिया के शामिल किये जाने का), रूस का समर्थन क्यूबा, वेनेजुएला और निकारागुआ ने किया था।

जिस भू-राजनीतिक संतुलन से निकारागुआ के नहर निर्माण की परियोजना जुड़ गयी है, वह साफ नजर आने लगी है।

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