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अरुण श्री की छः कविताएँ

arun shri1. मेरे विद्रोही शब्द

नहीं सामंत !
सम्मोहित प्रजा का आँकड़ा बढ़ाती संख्या नहीं मैं ।
मेरा वैचारिक खुरदरापन –
एक प्रखर विलोम है तुम्हारी जादुई भाषा का ।
पट्टे की कीमत पर पकवान के सपने बेचते हो तुम ।
मेरी जीभ का चिकना होना जरुरी है तुम्हारे लिए ।

नहीं सामंत !
रोटी का विकल्प नहीं हो सकतीं चंद्रयान योजनाएँ ।
प्रस्तावित अच्छे दिनों की कीमत मेरी जीभ नहीं है ।

नहीं सामंत !
तुम्हारे मुकुट का एक रत्न होना स्वीकार नहीं मुझे ।
शब्दों के विलुप्त होने की प्रक्रिया समझाते हुए तुम –
विद्रोही कवियों से एक अदद प्रशस्तिगान चाहते हो ।
लेकिन मेरे लिए सापेक्ष तुम्हारा झंडा थामने के –
कंगूरे से कूद आत्महत्या कर लेना बेहतर विकल्प है ।

नहीं सामंत !
अपनी क्रन्तिकारी कविताएँ मैं तुम्हे नहीं सौपूँगा ।
मेरे विद्रोही शब्द तुम्हारी भाषा का उपसर्ग नहीं बनेंगे ।

 

2. मैं देव न हो सकूँगा

सुनो ,
व्यर्थ गई तुम्हारी आराधना ।
अर्घ्य से भला पत्थर नम हो सके कभी ?
बजबजाती नालियों में पवित्र जल सड़ गया आखिर ।
मैं देव न हुआ ।

सुनो ,
प्रेम पानी जैसा है तुम्हारे लिए ।
तुम्हारा मछ्लीपन प्रेम की परिभाषा नहीं जानता ।
मैं ध्वनियों का क्रम समझता हूँ प्रेम को ।
तुम्हारी कल्पना से परे है झील का सूख जाना ।
मेरे गीतों में पानी बिना मर जाती है मछली ।
मैं अगला गीत “अनुकूलन” पर लिखूंगा ।

सुनो ,
अंतरंग क्षणों में तुम्हारा मुस्कुराना सर्वश्व माँगता है ।
प्रत्युत्तर में मुस्कुरा देता हूँ मैं भी ।
तुम्हारी और मेरी मुस्कान को समानार्थी समझती हो तुम –
जबकि संवादों में अंतर है -“ही” और “भी” निपात का ।
संभवतः अल्प है तुम्हारा व्याकरण ज्ञान –
तुम्हरी प्रबल आस्था के सापेक्ष ।

सुनो ,
मैं देव न हो सकूँगा ।
मेरे गीतों में सूखी रहेगी झील ।
मैं व्याकरण की कसौटी पर परखूँगा हर संवाद ।

सुनो ,
मुझसे प्रेम करना छोड़ क्यों नहीं देती तुम ?

 

3. बिल्ली सी कविताएँ

मैं चाहता हूँ कि बिल्ली सी हों मेरी कविताएँ ।

क्योकि –
युद्ध जीत कर लौटा राजा भूल जाता है –
कि अनाथ और विधवाएँ भी हैं उसके युद्ध का परिणाम ।
लोहा गलाने वाली आग की जरुरत चूल्हों में है अब ।
एक समय तलवार से महत्वपूर्ण हो जातीं है दरातियाँ ।

क्योंकि –
नई माँ रसोई खुली छोड़ असमय सो जाती है अक्सर ।
कहीं आदत न बन जाए दुधमुहें की भूख भूल जाना ।
कच्ची नींद टूट सकती है बर्तनों की आवाज से भी ,
दाईत्वबोध पैदा कर सकता है भूख से रोता हुआ बच्चा ।

क्योंकि –
आवारा होना यथार्थ तक जाने का एक मार्ग भी है ।
‘गर्म हवाएं कितनी गर्म हैं’ ये बंद कमरे नहीं बताते ।
प्राचीरों के पार नहीं पहुँचती सड़कों की बदहवास चीखें ।
बंद दरवाजे में प्रेम नहीं पलता हमेशा ,
खपरैल से ताकते दिखता है आँगन का पत्थरपन भी ।

क्योकि –
मैं कई बार शब्दों को चबाकर लहूलुहान कर देता हूँ ।
खून टपकती कविताएँ –
अतिक्रमण कर देतीं है अभिव्यक्ति की सीमाओं का ।
स्थापित देव मुझे ख़ारिज करने के नियोजित क्रम में –
अपना सफ़ेद पहनावा सँभालते हैं पहले ।
सतर्क होने की स्थान पर सहम जातीं हैं सभ्यताएँ ।
पत्ते झड़ने का अर्थ समझा जाता है पेड़ का ठूँठ होना ।

मैं चाहता हूँ कि बिल्ली सी हों मेरी कविताएँ –
विजय-यात्रा पर निकलते राजा का रास्ता काट दें ।
जुठार आएँ खुली रसोई में रखा दूध , बर्तन गिरा दे ।
अगोर कर न बैठें अपने मालिक की भी लाश को ।
मेरे सामने से गुजरें तो मुँह में अपना बच्चा दबाए हुए ।

 

4. इरोम चानू शर्मीला

एक ठहरे समय में दौड़ रहा है देश या भाग रहा है शायद ।
उन्ही रास्तों से गुज़रता है बार-बार –
जहाँ फैला हुआ निर्दोष खून तरसता है गवाहियों के लिए ,
जहाँ कुछ मुट्ठी भींचे लड़कियां कपडा नहीं, नारा पहनती हैं ,
जहाँ शादी की उम्र में एक लड़की छोड़ देती है रोटी खाना ।
लेकिन देश चुपचाप गुजर जाता है हर बार ।
बोला तो खैर अब तक नहीं ,
और परिणाम ये –
कि आज ‘सरकार’ लगभग पर्यायवाची शब्द है ‘देश’ का ,
अब सरकार तय करती है देश के मुद्दे ।

देश के पास वैसे तो और भी जरूरी मुद्दे हैं भूख के सिवा ।
लेकिन –
भूख को जरुरी बनाता है पेट-वोट का समानुपाती व्यवहार ।
सरकार समझती है भूख और भजन के बीच का सम्बन्ध ।
और सुना तो ये है –
कि देश वाकई गंभीर है भूख से होने वाली मौतों के प्रति ,
एक लड़की की भूख पर सरकार की नज़र रहती है बराबर ।

दरअसल गलत है भूख से मौत की अवधारणा ही ।
कथित तौर पर भूखे मरने वाले दोषी होंगे आत्महत्या के ।
इस देश में तो जो छोड़ देता है रोटी खाना –
उसकी नसों में नियमित रूप से भरा जाता है ग्लूकोज ,
नाक में नली घुसेड़ जबरन उड़ेले जाते हैं पौष्टिक पेय ।

खैर ,
देश तो होता ही महान है, महान होती है उसकी सेना भी ।
और पानी में रहते हुए –
कानून भी नहीं बोलता मगरमच्छ और पानी के विरुद्ध तो ।
एक कवि क्या कर लेगा बोलकर ,
और क्या कर लिया सेना की छाया में रहती लड़की ने भी ?

रसोई और शौचालय के बीच बसे इस देश के कई घरों में –
लगभग इक्कीस ग्राम की बनती हैं रोटियां ।
और कितना अजीब है कि कई सालों से बिना रोटी खाए –
इक्कीस ग्राम से कहीं अधिक है उसकी आत्मा का वजन ।
पानी पीकर पानी के लिए लड़ती हुई लड़की प्रमाण है ,
कि इक्कीस ग्राम के बराबर पानी का वजन –
कहीं अधिक होता है इक्कीस ग्राम की ही रोटी से ।

इस संक्रमित-दुर्बल समय के शोर से शक्तिशाली उसका मौन ।
एक सभ्यता का नाम है ‘इरोम चानू शर्मीला’ ।
देश का कानून उसे असभ्यता के अपराध का दोषी मानता है ।

 

5. यार कवि

यार कवि ।
थोड़ा हँसा करो कभी , कभी रो भी लिया करो थोड़ा ,
यूँ ही किया करो कुछ बे-मतलब की बातें कभी-कभी ।
जरूरी तो नहीं कि –
तुम खाँसो तो भी हिला देना चाहो शेषनाग का फन ।
मुट्ठियाँ भींचे-भींचे दर्द भी तो करती होंगी उँगलियाँ ?

यार कवि ।
कलम उठाओ तो कभी लिख लो हथेली पर कोई नाम ,
डायरी के पन्ने पर छोटी-छोटी सामानांतर रेखाएं खींच –
काट दो किसी तिर्यक रेखा से ,
किसी पुरानी तस्वीर के माथे येब्बड़ी सी बिंदी बना दो ।
जिंदाबाद-जिंदाबाद चिल्लाने वाली मशीन तो नहीं तुम ।

यार कवि ।
इतना भी गैरजरुरी नहीं आँगन उगी बेल की तारीफ ।
ऐसा भी क्या –
कि नाप-तौल कर ही खर्च करो अपने शब्द हर बार ,
आवाज में बनाए रखो एक नीरस-औपचारिक मधुरता ।
कुछ तो दिखे जीवन और समझौते के बीच का फर्क ।

यार कवि ।
कभी-कभी तो लौटा लाओ आपना बचकानापन भी ,
चीखों कि तुम्हारे हर लिखे को कविता न समझा जाय ।

 

6. पिऽया अपने त गइलें कलकतवा रे नाऽ

पुरानी लोक-कहानियों में –
नए प्रेम पर रोटी का प्रश्न लिए कलकत्ते चले जाते पिया ।
पिया-प्रेम में पड़ी नई ब्याहता के हिस्से आता वियोग ।
वो अकेले जाँत पीसती जँतसार में पिरोती अपनी विरह –
“पिऽया अपने त गइलें कलकतवा रे नाऽ”
जाँत के भारी हो जाने की बात करती –
बताना चाहती कि कुछ कमजोर हो गई है इन दिनों ,
याद करती झींक देते पिया के हाथ, चुहल करती आँखें ।
कलकत्ते से हर महीने आता लिफाफाबंद प्रेम और रोटी ।

मैं कलकत्ता नहीं गया कभी ,
मुझे पसंद था कविताओं में लिखना प्रेम और भूख भी ।
लेकिन –
कविताओं से हल नहीं होते भूख के जटिल समीकरण ।
बूढी हड्डियों की हिम्मत को तिल-तिल मारता दर्द –
इकलौती बैसाखी के टूटने से कम होगा या फिर दवा से ।
जीवन का ये गैर-साहित्यिक गणित –
कम जरुरी विषय नहीं है, भाषा के व्याकरण की अपेक्षा ।

अपने बिस्तर का एक कोना कलकत्ता बना रखा है मैंने ।
दुसरे कोने पर मेरी ब्याहता –
जाँत पीसते हुए, पीसती है अपने कुछ सुरीले सपने भी ।

एक हाथ कलकत्ता और दुसरे हाथ प्रेम सँभालते हुए मैं ,
कविताओं और बेटे में करता हूँ –
अपने समय का सबसे जोखिम भरा निवेश ।
मेरी ब्याहता नहीं गाती कोई विरह गीत –
कि कहीं अधूरी न छूट जाएँ लिखी जाती प्रेम कविताएँ ।
मेरा खून जलता है, उसके आँसू भी सूखते है साथ-साथ ।
रोटी और कविताओं के बीच –
उलझा-बिखरा हुआ मैं, उसे चूमना भूल जाता हूँ अक्सर ।

प्रस्तुति : नित्यानंद गायेन

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4 comments

  1. आशीष मिश्र

    सुंदर कविताएं, कुछ कविताएं बहुत सुंदर हैं! हार्दिक बधाई !!

  2. आद्भुत, एक से बढ़कर एक. अनोखे कथ्य के साथ, स्व्यमेव गतिमान कविताये. अपना ही बना लिया आरुन जी आपने तो.

  3. प्रदीप कुमार दीपक

    इतनी सटीक और मारक क्षमता वाली विद्रोही कविताओं से मेरी मुलाकात पहली बार हुई है. अरुण जी को बहुत बहुत धन्यवाद युग धर्म का पालन करने के लिए ।

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