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जीने, लिखने और लड़ने की एकजुटता

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साहित्य में समाज को जीने की मुसीबतें बढ़ गयी हैं।

सरकारें चाहती हैं, आप उसके लिये ‘हां‘ में सिर हिलायें। यदि आप सिर हिलाते हैं, तो साहित्य में समाज को धोखा देते हैं, और नहीं हिलाते हैं, तो सरकार आपके पीछे पड़ जायेगी। बाजार में आपकी शाख गिरा दी जायेगी। आप जो नहीं हैं, वह बना दिये जायेंगे। असामाजिक और अराष्ट्रीय बनाना सबसे आसान है। हिंदू या मुसलमान बनाना उससे भी आसान। आपको सामाजिक विकास विरोधी बनाने में ज्यादा समय नहीं लगेगा।

इस देश में एक विरोध अभी-अभी मरा है।

बढ़ती हुई असहिष्णुता के खिलाफ प्रतिष्ठित साहित्यकारों, इतिहासकारों, वैज्ञानिकों और प्रबुद्ध वर्ग के लोगों ने सरकारी एवं अकादमी पुरस्कारों को लौटाना शुरू किया। यह इस बात की चेतावनी थी, कि सरकार हमारी चिंताओं को समझे।

अपनी चिंताओं को समझाने का यह असंगठित तरीका था।

सरकार इसे समझ गयी।

काॅरपोरेट सरकारों की समझ जैसी होती है, ठीक वैसे ही समझी।

उसने यह प्रमाणित करना शुरू कर दिया कि

यह एक खेमे की बकवास है।

यह सरकार विरोधी प्रगतिशील-वामपंथी समझ रखने वालों की कारस्तानी है।

समाज में कहीं असहिष्णुता नहीं।

पुरस्कार और सम्मान लौटाना राष्ट्रद्रोह है। गलत है। सरकार को बद्नाम करने की कोशिश है। यह देश के आर्थिका विकास को रोकने, सामाजिक समरसता को बिगाड़ने और जो नहीं है, उसे दिखाने की कोशिश है।

यह जन विरोधी है।

यह बहुमत प्राप्त सकरार को अस्वीकार करना है।

विरोध को राजनीतिक बना दिया गया।

विरोध का मुद्दा संसद और राजनीतिक दलों के पाली में पहुंच गया।

यह पता ही नहीं चला कि कौन सही है, कौन गलत है? मुद्दे का क्या हुआ?

खबर बेचने वालों ने उसे बेचना बंद कर दिया।

सरकार ने उसकी स्वीकृति नहीं दी।

पूरे तंत्र के जरिये ‘बढ़ती हुई असहिष्णुता’ के खिलाफ बुद्धिजीवी वर्ग के विरोध का विरोध किया गया।

स्थितियां बिल्कुल नहीं बदली। मुद्दों के साथ बुद्धिजीवी वर्ग के विरोध को खारिज कर दिया गया।

अब सरकार और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ तथा भाजपा के तमाम सहयोगी संगठन एक सुर में काम कर रहे हैं।

सरकार सहिष्णुता का प्रदर्शन कर रही है। अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों को सम्मानित कर रही है। लगे हाथ, संघ और हिन्दुवादी संगठनों को आगे बढ़ने की खुली छूट दे रही है। सहयोग दे रही है। उनके पक्ष में माहौल बना रही है। संघ हिन्दुवाद और राष्ट्रवाद को आपस में जोड़ चुकी है। खुले आम इस बात का प्रदर्शन हो रहा है कि गैर हिन्दुवादी होना अराष्ट्रीय होना है। एक राष्ट्र को एक संगठन में बदला जा रहा है। भारतीय संस्कृति का पट्टा सरकार संघ को सौंप चुकी है। सामाजिक विकास को मानसिक नियंत्रण में बदला जा रहा है। शिक्षा से लेकर संस्कृति को अपने नियंत्रण में लेने की कारगर कोशिशें हो रही हैं। फासिस्टवाद को बढ़ाया जा रहा है।

फासिस्टवाद की अच्छी समझ रखने वाले जिन वामपंथी बुद्धिजीवियों ने असहिष्णुता के मुद्दे को उठाया, उन्होंने यह क्यों समझ लिया कि भारत में वह शराफत से पेश आयेगी?

इस देश में फासिस्टवाद के खिलाफ लड़ने की पूरी तो क्या अधूरी तैयारी भी नहीं है। जबकि इन ताकतों के पास एक चुनी हुई सरकार है, उस सरकार के पीछे बाजारवाद की वित्तीय ताकत है, जिसके नियंत्रण में अब सरकार है, और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ जैसे संगठन हैं। आप मानें या न मानें इन ताकतों के पास जनाधार है। मान लें कि बाजारवाद के नियंत्रण में वैश्विक व्यवस्था और दुनिया की ज्यादातर देशों की सरकारें हैं। जिसके खिलाफ सिर्फ मानसिक लड़ाई नहीं लड़ी जा सकती।

भारत में फासिस्टवाद का सीधा अनुभव नहीं है, वह ब्रिटिश औपनिवेशिक काल के गुलामी और दमन तक सीमित है। वैसे भी उसके पास अभी लोकतंत्र की पोशाक है, जिसे पहन कर वह अपनी चमक दिखा रहा है। इस चमक के पीछे खड़ी ताकतों की सूरतें साफ-साफ नहीं दिख रही हैं।

जब तक सूरतें साफ-साफ नजर नहीं आयेंगी, लोगों के दिल-दिमाग और बदन पर अपने निशान नहीं दिखायेंगी, तब तक लोगों को न तो फासिस्टवाद नजर आयेगा ना ही वित्तीय तानाशाही को वो समझ पायेंगे। हमारे सामने जिम्मेदारियां तो बड़ी हैं बंधु, सवाल यह है हम कितने तैयार हैं?

मैं आपसे क्षमा के साथ कहना चाहता हूं, कि ‘हम बिल्कुल तैयार नहीं हैं।’ देश की आम जनता -जिसके बिना कोई भी लड़ाई लड़ कर जीती नहीं जा सकती- वह बिल्कुल तैयार नहीं है। मैं आपकी ईमानदारी पर सवाल खड़ी नहीं कर रहा हूं, ना ही देश की आम जनता की लापरवाही पर किया गया यह सवाल है, बल्कि मैं सिर्फ इतना कहना चाहता हूं कि जो लड़ाई हमें लड़नी ही है, उसकी तैयारी शुरू होनी चाहिए। आपने मुद्दों को उठा कर देख लिया, प्रतिकात्मक विरोध भी जाहिर किया, परिणाम आपके सामने है।

साहित्य में भी समाज को जीने की मुसीबतें हमें मिल कर उठानी चाहिए। छोटे मुद्दों की बड़ी अहमियत है, मगर तब, जब वो मुद्दों के साथ लोगों को आपस में जोड़ें। यदि हम साहित्य और समाज को धोखा नहीं दे सकते तो आपस में जुट कर जीने, लिखने और लड़ने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। जैसे, लिखने और लड़ने की एकजुटता भी जरूरी है।

आलोकवर्द्धन

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