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गलोबल रेटिंग एजेन्सी की मेज पर भारत

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ग्लोबल रेटिंग एजेन्सी की मेज पर किसी देश के होने का मतलब है, कि निवेशकों के लिये आर्थिक सुधारों की मांग को बढ़ाया जा रहा है। उस देश की सरकार पर इस दबाव को बढ़ाया जा रहा है, कि ‘‘उसकी रफ्तार सुस्त है। उसे राजनीतिक ढकोसलों से ऊपर उठ कर निर्णय लेना चाहिये।‘‘

यदि सरकार ऐसा कर पाती है, तो ठीक है और नहीं कर पाती है, तो सत्तारूढ़ राजनीतिक दल के सामने सरकार से बाहर जाने का रास्ता चैड़ा होने लगता है। भारत की मोदी सकरार के सामने कुछ ऐसी ही परिस्थितियां हैं। संसद ठप्प है। मानसून सत्र की हालत खराब है। विधेयकों की शक्ल में निजी कम्पनियां और काॅरपोरेशनों का हित लम्बित है। संसद के तख्त के सामने तख्तियां लहरा रही हैं, विपक्ष के नारे लग रहे हैं, कांग्रेसी सांसदों का निलंबन हो रहा है। भारत के सबसे वाचाल प्रधानमंत्री की बोलती बंद है। हाय-तौबा मचा हुआ है। फिल्मी अंदाज में यह कहने की नौबत आ गयी है, कि ‘तेरा क्या होगा……………?

ग्लोबल रेटिंग एजेन्सी ‘मूडीज काॅर्प‘ की ‘इकोनाॅमिक रिसर्च यूनिट- मूडीज एनाॅलिटिक्स‘ ने भारत के बारे में रिपोर्ट पेश कर दी है कि ‘‘देश की छवि को नुक्सान पहुंच रहा है, और निवेशकों के विश्वास को चोट पहुंच रही है।‘‘

मोदी जी जानते हैं, कि ‘‘चोटिल सांप जिसके हाथ में डंडा है, पलट कर वार उसी पर करता है।‘‘ और सरकार किसकी है और डंडा किसके हाथ में है? यह बताने की जरूरत नहीं। यह भी एक नजारा है, कि सापं के हाथ में निर्णायक डंडा है।

रिपोर्ट में कहा गया है, कि ‘‘संसद में जारी गतिरोध और आर्थिक सुधारों की सुस्त रफ्तार कारोबारी विश्वास को हानि पहुंचा रही है। यदि भारत को चीन की बराबरी करनी है, तो उसे सुधारों की रफ्तार तेज करनी होगी।‘‘ यही नहीं ‘‘भारतीय रिजर्व बैंक की ब्याज दरें तय करने की स्वतंत्रता से छेड़छाड़ न करने की चेतावनी भी दी गयी है।‘‘

यह चेतावनी उस मोदी सकरार के लिये है, जो राजनीतिक मोर्चे पर नाकाम होती जा रही है, या उतनी कारगर नहीं है, जितने की अपेक्षा वित्तीय ताकतों को रही हैं। अध्यादेशों के माध्यम से वह अपनी नियत और अपनी प्रतिबद्धता तो दिखा रही है, किंतु भूमि अधिग्रहण विधेयक, श्रम कानूनों में संशोधन और वस्तु एवं सेवाकर विधेयक को संसद में पारित नहीं करा सकी है। लोकसभा में स्पष्ट बहुमत होने के बाद भी, राज्य सभा में वह विपक्ष को अपने साथ -विधेयकों के पक्ष में- खड़ा करने में नाकाम रही है, जहां उसके पास स्पष्ट बहुमत नहीं है। और 2016 तक इन स्थितियों में किसी भी किस्म के परिवर्तन की उम्मीद भी नहीं बनती है।

संसद में विपक्ष -विशेष रूप से कांग्रेस- ललित गेट और व्यापम तथा भ्रष्टाचार के खुलते मामलों को मुद्दा बना चुकी है। मानसून सत्र में गतिरोध की वजह भी यही है। भूमि अधिग्रहण विधेयक पर संवाद एवं सहमति की स्थिति भी नहीं है। संसद की संयुक्त समिति भी उलझ चुकी है। मोदी के बढ़ चढ़ कर बोलने और खम ठोंकने की अदा को गहरा झटका लगा है। कुछ ऐसा भी नहीं हो पा रहा है, कि उनके इवेन्ट मैनेजर कुछ ऐसा करें कि बोतल से निकला जिन्न या तो फिर से बोतल में घुस जाये, या विपक्ष के खिलाफ बोतल से नया जिन्न निकल आये। ‘नगा उग्रवादियों के साथ शांति समझौता‘ अब तक सरकार के लिये राहत देने वाली घटना नहीं बन सकी है।

मोदी सकरार 2013 के भूमि अधिग्रहण विधेयक की ओर लौटने का दिखावा भी कर रही है, क्योंकि भाजपा शासित राज्यों में विकास के माध्यम से भूमि अधिग्रहण को लागू करने का रास्ता निकाल लिया गया है। इसके बाद भी राजनीतिक भ्रष्टाचार का मामला, विपक्ष में रहते भाजपा ने जो किया था, उसी राह से लग गया है। और कांग्रेस जब सत्तारूढ़ थी, उसी रास्ते पर सत्तारूढ भाजपा आ गयी है। यदि आर्थिक मुद्दों के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ तो गुरू गूड़ और चेला चीनी बनते-बनते रह जायेगा।

वैसे चेला गुरू से ज्यादा शातीर है, ऐसा हमने कहीं सुना है। जैसे भूमि अधिग्रहण के मामल में राज्य सरकारों की विकास योजनाओं को जरिया बना लिया गया और 2013 के यूपीए की मनमोहन सरकार के विधेयक की ओर लौटने का जो दिखावा किया जा रहा है, उसी तरह भारतीय वित्त संहिता के संशोधित मसौदे के लिये भी रास्ता बनाया जा सकता है, जिसके बारे में ‘मूडीज‘ का ‘मूड‘ खराब है। उसके इकोनाॅमिक रिसर्च यूनिट का कहना है, कि ‘‘यह मसौदा रिजर्व बैंक आॅफ इण्डिया की स्वतंत्रता पर आघात है।‘‘

मूडीज एनालिटिक्स ने कहा है, कि ‘‘भारतीय वित्त संहिता का संशोधित मसौदा ब्याज दर तय करने के लिये एक समिति बनाने की पेशकश करता है, जिसमें सात सदस्यों को सकरारी नामित करेगी। संशोधित मसौदे में रिजर्व बैंक आॅफ इण्डिया के गर्वनर को ‘विटो‘ का अधिकार नहीं दिया गया है।‘‘ जबकि आरबीआई के गर्वनर के पास यह अधिकार पहले से रहा है। रिपोर्ट में निष्कर्ष निकाला गया है, कि ‘‘सरकार के द्वारा चुना गया पैनल रिजर्व बैंक की स्वतंत्रता पर आघात है। जिससे बैंक की क्षमता प्रभावित होगी। उसकी विश्वसनियता कम होगी। राजनीतिक आधार पर निर्णय लिये जायेंगे और रिजर्व बैंक की पारदर्शिता में कमी आयेगी।‘‘ यह भी कहा गया है, कि ‘‘भारतीय रिजर्व बैंक की स्वतंत्रता को यदि कम किया जाता है, तो बढ़ती हुई महंगाई को घटाने की उम्मीदें भी घटेंगी।‘‘

सभी निष्कर्षों का बस एक ही मतलब है, कि भारतीय रिजर्व बैंक की स्वतंत्रता को घटाना गलत है। उसे सरकार के नियंत्रण से इतना बाहर होना चाहिये, कि ‘‘उसे बैंकिंग के मामलों में एकाधिकार प्राप्त हो।‘‘

किसी भी देश की अर्थव्यवस्था को अपने नियंत्रण में रखने के लिये वैश्विक वित्तीय ताकतों का यह कारगर हथियार रहा है, कि उस देश के ‘बैंकिंग सिस्टम‘ को अपने नियंत्रण में रखा जाये। इस नियंत्रण से उस देश की मौद्रिक नीतियां और स्वयं मुद्रा उनके नियंत्रण में आ जाता है। आम जनता जिस बैंक और मुद्रा को अपना और अपने देश का समझती है, वास्वत में वो वैश्विक वित्तीय ताकतों के नियंत्रण में होती है। सरकारें उन ताकतों का साझेदार बन गयी हैं। भारत की स्थिति इससे अलग नहीं है। वह ‘बैंक आॅफ इण्टरनेश्नल सेटलमेंट‘ का सदस्य देश है। ‘रिजर्व बैंक आॅफ इण्डिया‘ ‘बैंक आॅफ इण्टरनेश्नल सेटलमेंट‘ का सदस्य है। जिसके तहत सभी भारतीय बैंक है।

वित्तीय पूंजी ने -जिसका निजीकरण हो गय है, और सरकारें जिसका साझेदार भर रह गयी हैं- दुनिया भर में बैंकों और वित्तीय इकाईयों का जाल बिछा लिया है, जिसके जरिये वह वैश्विक मुद्रा बाजार भी उसके नियंत्रण से बाहर नहीं है। निजी वित्तीय पूंजी का साम्राज्य कायम हो चुका है। जिसके नियंत्रण में सरकारें हैं। इससे बड़े साम्राज्य का निर्माण इससे पहले कहीं नहीं हुआ।

वल्र्ड इकोनाॅमिक फोरम, विश्व बैंक – अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष जैसी वैश्विक वित्तीय इकाईयां और वाॅल स्ट्रीट के बैंकों के कब्जे में दुनिया का कारोबार और मुद्रा बाजार है। जो दुनिया भर के बिलेनियरों और मिलेनियरों से संचालित होती हैं, जहां आम आदमी के लिये कोई जगह नहीं। यहां तक कि सरकारें भी मुक्त नहीं हैं। कहा जा सकता है कि वित्तीय इकाईयां राज्यों की सरकारों से कहीं ज्यादा ताकतवर हो गयी हैं। सरकारों को चलाने का काम भी वो ही कर रही हैं।

अमेरिकी फेडरल रिजर्व -जिसे अमरिकी मुद्रा डाॅलर को छापने का अधिकार है, और जो अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा के रूप में दशकों से स्थापित रहा है- के 100 साल पूरा होने पर गये साल से पहले -2013 में, इस सवाल पर विराम यह कह कर लगाया था, कि ‘‘उसके आंकड़ों और रिपोर्ट को सार्वजनिक करना जरूरी नहीं, क्योंकि वह एक निजी कम्पनी (इकाई) है।‘‘ जिसके तहत ज्यादातर अमेरिकी बैंक हैं। अमेरिकी सरकार या अमेरिकी मीडिया ने यह सवाल ही नहीं किया, कि ऐसा क्यों किया गया? और कब हुआ? जानकारियां सार्वजनिक क्यों नहीं की गयीं?

दुनिया की ज्यादातर देशों की सरकारों ने -वित्तीय ताकतों के पक्ष में- अपने देश की आम जनता के साथ धोखा किया है। उन्होंने इस बात की स्वीकृति न तो अपने देश की आम जनता से ली, ना ही इस सच को सार्वजनिक किया, कि अब अपने देश के रिजर्व, फेडरल और सेण्ट्रल बैंकों में सरकार की साझेदारी कितनी है? है भी या नहीं है? इसलिये मूडीज का यह कहना, कि रिजर्व बैंक आॅफ इण्डिया की स्वतंत्रता से छेड़छाड़ का प्रयास खतरनाक है, और हाल में आया मसौदा आरबीआई के अच्छे काम पर पानी फेर सकता है।‘‘ इस बात का खुला संकेत है, कि सरकार ऐसा न करे। उसने इस बात के स्पष्ट संकेत दिये हैं, कि ‘‘इस मसौदे का संसद से पारित होना मुश्किल है।‘‘

वैसे भी मोदी सरकार उन्हीं की बिल्ली है। वह ‘म्याऊं‘ करने की स्थिति में नहीं है। उसका इरादा भी नही। ऐसे इरादों से होने वाले नुक्सान की समझ उसे है। यदि मूडीज यह कहता है, कि ‘‘भारत की राजनीतिक लड़ाई कारोबारी विश्वास को चोट पहुंचा रहा है। उच्च सदन (राज्य सभा) में बहुमत के बिना सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी की ताकत कम हो गयी है और विपक्ष ने, प्रस्तावित भूमि अधिग्रहण विधेयक, श्रम कानून को लचीला बनाने और वस्तु एवं सेवा विधेयक जैसे सुधारों में अडंगे लगा रही है।‘‘ तो समझा जा सकता है, कि वित्तीय ताकतें आम जनता के पक्ष में नहीं हैं। वो आर्थिक विकास एवं अपने पक्ष में होने वाले सुधारों को रोकने वाली किसी भी राजनीतिक प्रक्रिया को गैर जरूरी समझते हैं।

मोदी सरकार इन ताकतों के प्रति जैसी प्रतिबद्धता दिखा चुकी है, यदि वह इन ‘सुधारों‘ के लिये जरूरी वातावरण तैयार नहीं करती है, तो उसके सामने राजनीतिक संकट होगा। उसके हक में ऐसी स्थितियां भी बन सकती हैं, कि राज्य सभा में उसके लिये बहुमत की ऐसी व्यवस्था बनायी जाये कि उसकी नकेल कसी रहे।

हमारे खयाल से कमजोर विपक्ष की एकजुटता का विशेष कोई महत्व नहीं है। वह कांग्रेस के नेतृत्व में कच्चे धागे से बंधी है। जिनके लिये आम जनता का हित अपने जनाधार को बढ़ाने का ऐसा जरिया है, जिससे राजसत्ता तक पहुंच बनी रहे। इसलिये विपक्ष की एकजुटता आम जनता के हितों का विकल्प नहीं है।

वैश्विक वित्तीय ताकतों के निर्णायक विस्तार के साथ ही लोकतंत्र में सरकारों की वक़त इतनी घट गयी है, कि एक सरकार के बाद दूसरी सरकार का मतलब एक जनविरोधी सरकार के बाद दूसरी जनविरोधी सरकार हो गया है। जन प्रतिरोध प्रायोजित और विरोध नकली है। मुख्य धारा की मीडिया की तरह ही ग्लोबल रेटिंग एजेन्सियां किसी भी देश की सरकार पर सरकार विरोधी माहौल बनाने का काम कर रही है, जिनका हिता निजी कम्पनियों और काॅरपोरेशनों से जुड़ा है।

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