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मोदी के लिये मूडीज़ की राहें

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ग्लोबल रेटिंग एजेन्सी ‘मूडीज़ इन्वेस्टर सर्विस‘ ने 18 अगस्त को जारी किये गये ‘ग्लोबल मैक्रो आउटलुक – 2015-16‘ की रिपोर्ट में भारत के आर्थिक विकास दर को 7.5 प्रतिशत से घटा कर 7 प्रतिशत कर दिया और लगे हाथ निवेश के लिहाज से न्यूनतम रेटिंग ‘बीएए 3‘ के दर्जे में रखा है।

यह सब पूरी तरह से सुनियोजित और देश की मोदी सरकार के लिये चेतावनी से उसके सही होने के तर्क की तरह ही लगता है। यह बात इससे पहले के आलेखों में हमने स्पष्ट कर दिया है, कि दुनिया भर की रेटिंग एजेंसियां किस तरह वैश्विक वित्तीय ताकतों -विश्व बैंक, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष, निजी कम्पनियों और कारपोरेशनों- के इशारे पर काम करती हैं, और कैसे उस वातावरण का निर्माण करती हैं, कि सरकारें दबाव में आती चली जायें।

मोदी सरकार को चेताते हुए उसके लिये तर्क बनाने का काम मूडीज़ कर रही हैं भारतीय मीडिया जिस तरह इन रिपोर्टों को जगह देती है, और जिस तरह उसे प्रचारित करती है, वह भी पश्चिमी मीडिया की परछाईयों के अलावा और कुछ नहीं है। जिसका एक ही अर्थ निकलता है, कि सरकार उन सुधारों को गति दे जो बाजारवादी अर्थव्यवस्था के लिये जरूरी है। कि इन सुधारों के अलावा आर्थिक विकास की कोई दिशा नहीं है।

जबकि इस बात को हम अच्छी तरह जानते हैं, कि विश्व बाजार व्यवस्था के इन्हीं सुधारों की वजह से वैश्विक अर्थव्यवस्था संकटग्रस्त है। यूरोप हाथ फैला कर खड़ा है, और अमेरिकी अर्थव्यवस्था कागज के ढ़ेर पर खड़ी है, जिसके नीचे सुरक्षित मानदण्डों का ठोस आधार नहीं है। जब भी किसी ठोस मानक (स्वर्ण) में गिरावट आती है, अमेरिकी डाॅलर में फौरी मजबूती नजर आने लगती है, किंतु जैसे-जैसे ठोस मानक पदार्थ में तेजी आती है, डाॅलर अपनी जगह से गिरने लगता है। पूरी अर्थव्यवस्था सट्टेबाज हो गयी है।

मूडीज़ विकास दर में गिरावट की दो वजह बताता है-

  1. भारत में मानसून का कमजोर होना।
  2. मोदी सरकार के द्वारा आर्थिक सुधारों में सुस्ती!

भूमि अधिग्रहण विधेयक

श्रम कानूनों में संशोधन विधेयक

और वस्तु एवं सेवा कर विधेयकों के लिये आम सहमति का न बन पाना।

इससे पहले के रिपोर्ट में मूडीज़ ने भारत की राजनीतिक संरचना एवं वैधानिक प्रक्रिया में आयी रूकावटों का जिक्र कर चुकी है, और रिजर्व बैंक की स्वायत्ता का मुद्दा उठा चुकी है।

रिपोर्ट में कहा गया है, कि ‘‘हमारे अनुमानों के आधार पर मुख्य जोखिम सुधारों की रफ्तार का सुस्त होना है। सुधारों के लिये जरूरी आम सहमति कमजोर हुई है। वस्तु एवं सेवा कर को लागू करने की प्रक्रिया लम्बी है। जिसके लिये संवैधानिक संशोधन की जरूरत है। इसके अलावा कम से कम 19 राज्यों की सहमति जरूरी है।

इसके बाद भी, भारत और चीन की व्यावसायिक प्रतिद्वन्दिता को बढ़ाने की गरज से आंकलन करता है, कि ‘‘भारत इस वर्ष चीन को आर्थिक विकास के मोर्चे पर पछाड़ सकता है।‘‘ चीन के लिये मूडीज़ का आंकलन है, कि इस वर्ष चीन का विकास दर 6.8 प्रतिशत और 2016 में 6.5 प्रतिशत जीडीपी ग्रोथ का होगा। दशक के अंत तक चीन का विकास दर 6 प्रतिशत तक पहुंचने का अनुमान है। मूडीज़ भारतीय रिजर्व बैक के ब्याज दर को घटाने की पेशकश करता है।

मूडीज़ के खयाल से नरेन्द्र मोदी की राहें धीरे-धीरे मुशिकल होती जा रही हैं। मानसून के बरसात की कमी, राजनीतिक गति अवरोधों की वजह से सुधार में सुस्ती और भारतीय उद्योग जगत के विकास में खड़ी रूकावटों की वजह से मोदी के आर्थिक सुधारों को झटका लग सकता है। भारतीय काॅरपोरेट को लगातार चौथी तिमाही में भी, उनके शुद्ध मुनाफा में, गिरावट का सामना करना पड़ रहा है। ‘‘कम्पनियां सस्ते आयात और ऊंची ब्याज दरों के कारण क्षमता बढ़ाने पर निवेश में देरी से जूझ रही हैं।‘‘ मूडीज़ के आंकलन के हिसाब से ‘‘यह सब उम्मीद से कहीं ज्यादा लम्बा खिंच गया है।‘‘

इन स्थितियों से उबरने के लिये नरेन्द्र मोदी को राजनीतिक गोटियों से ज्यादा एकाधिकारवादी सोच और राजनीतिक शैली से उबरने की जरूरत है। यह समझने की जरूरत है, कि कांग्रेस और विपक्ष चाहे जितना भी कमजोर हो, उसके सहयोग के बिना आर्थिक विकास योजनाओं को लागू करना और देश की अर्थव्यवस्था को बाजारवादी पटरी पर डालना संभव नहीं है। यह समझने की जरूरत है मोदी सरकार को, कि वह जनाधार पर नहीं काॅरपोरेट के समर्थन पर खड़ी है। जिसकी उम्मीदों को उन्होंने बे-लगाम कर दिया है।

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