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वैश्विक वित्तीय संकट और चीन

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जिस विश्वव्यापी मंदी की आशंकायें व्यक्त की जा रही थीं, वह अब दुनिया के बाजार में है। चारो ओर हड़कम्प मचा हुआ है।

सभी अपनी अर्थव्यवस्था को बचाने,

संकट से मिले मौके का फायदा उठाने

और दुनिया की आम जनता को नये सिरे से संकट में डालने और धोखे में रखने के लिये ऐसे भाग-दौड़ रहे हैं, जैसे उनके भाग-दौड़ का कोई परिणाम निकल सकता है। ऐसा कुछ हो सकता है, जिसकी कल्पना पहले से नहीं की गयी थी।

उनकी कोशिश इस व्यवस्था को बचाने और उसके असंदर्भित हो चुके सच को छुपाने की है।

2007-08 के वैश्विक मंदी की वजह अमेरिकी अर्थव्यवस्था के लड़खड़ाने और यूरोपीय देशों के दिवालियापन को बढ़ाने वाले कर्ज का संकट है। जिससे दुनिया आज तक नहीं उभर सकी है।

24 अगस्त 2015 की यह मंदी, मुक्त व्यापार के नये क्षेत्र का निर्माण करने वाली दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था चीन के लड़खड़ाने की वजह से है।

सोमवार 24 अगस्त को चीन के शेयर मार्केट में आयी भारी गिरावट और इस चिंताजनक तथ्य ने कि दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी चीन की अर्थव्यवस्था की गति धीमी पड़ रही है, ने उभरती बाजारवादी अर्थव्यवस्था में खलबली मचा दी और विश्व स्टाॅक मार्केट में भारी गिरावट आ गयी। और 11 अगस्त को डाॅलर के मुकाबले चीन की मुद्रा युआन के 2 प्रतिशत के अवमूल्यन ने, विश्व बाजार को अब तक 5,000 अरब डाॅलर की गहरी चोट दी। इन चोटों का पड़ना अभी जारी है, और इस धनराशि का बढ़ना भी अभी थमा नहीं है।

यह एक अनिवार्य तथ्य है, कि जब तक चीन की अर्थव्यवस्था समाजवादी रास्ते पर चलती रही, विश्व बाजार व्यवस्था के चढ़ाव और उतार का प्रभाव भी उस पर कम पड़ा और सामाजिक विकास की संभावनायें -अपने तमाम सवालों के बाद भी- बनी रही, लेकिन मुक्त व्यापार और बाजारपरक अर्थव्यवस्था की राह पकड़ते ही उसके आर्थिक विकास की दिशा उत्पादन और निर्यात पर टिकती चली गयी, जिसकी वजह से उसकी आंतरिक जटिलतायें भी बढ़ीं, समाजवादी समाज निर्माण का स्वरूप विकृत हो गया, निजी कम्पनियों को जगह मिली, जनअसंतोष बढ़ता चला गया और वह वैश्विकक वित्तीय संकट का उतना ही बड़ा किरदार बन गया, जितना यूरोपीय देश और अमेरिकी साम्राज्य है।

कह सकते हैं, कि यह संकट मुक्त व्यापार के नये क्षेत्रों की रचना करने वाले चीन की उभरती हुई वित्त व्यवस्था की सौगात है। वह भी यूरो-अमेरिकी साम्राज्यवादी जमात का बाजारवादी ऐसा देश है, जिसकी प्रतिस्पद्र्धा अमेरिकी साम्राज्य से है।

मतलब…? वित्तीय साम्राज्यवाद और मुक्त व्यापार का सम्बंध खुले रूप में वैश्विक वित्तीय संकट से है। इसका संबंध पूरब या पश्चिम से नहीं, नवउदारवादी वैश्वीकरण और बाजारवाद से है।

24 अगस्त को शंघाई कम्पोजिट इण्डेक्स में 8.5 प्रतिशत की गिरावट आयी, जो कि फरवरी 2007 के बाद की सबसे तेज गिरावट है। जून से अब तक के बीच शंघाई कम्पोजिट इंडेक्स में 38 प्रतिशत की गिरावट आयी है। गिरावट का यह दौर एशिया के सभी बड़े एक्सचेंज में भी जारी रहा। जापान के स्टाॅक एक्सचेंज में 4.6 प्रतिशत की गिरावट आयी, हांगकांग के स्टाॅक एक्सचेंज में 5.2 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गयी।

इस गिरावट ने यूरोप को भी प्रभावित किया। ब्रिटेन जर्मनी और फ्रांस के इंडेक्स में 4.6 से 5.2 तक की गिरावट दर्ज की गयी। इसने पूरे मध्यपूर्व एशिया और लातिनी अमेरिका को भी अपनी गिरफ्त में ले लिया।

यह गिरावट संयुक्त राज्य अमेरिका में सबसे तेज और गहन थी। ‘डाउ जोन्स इण्डस्ट्रीयल एवरेज में 588 अंक की गिरावट आयी और 4 मिनट के अन्दर ही उसमें 1089 अंक (6.6 प्रतिशत) की गिरावट आ गयी। ‘डाउ जोन्स‘ शेयर बाजार के खुलते ही ध्वस्त हो गया। यह अमेरिकी इतिहास की एक दिन में सबसे बड़ी गिरावट है। ‘नैस्डैक‘ में 400 अंकों (8 प्रतिशत से ज्यादा) की गिरावट आई और एस एण्ड पी 500 में 100 अंकों से ज्यादा (लगभग 5 प्रतिशत) की गिरावट आ गयी।

इतने बड़े पैमाने पर अबाध गति से गिरते बाजार और स्टाॅक की लगातार बिक्री हो रही थी, कि बाजार के विश्लेषकों और उसकी जानकारी देने वाले उद्घोषक तक सक्ते में आ गये। उन्होंने इसकी तुलना 1987 के खरीदी-बिक्री की आपदा से की। जब एक दिन में डाउ जोन्स में 22 प्रतिशत की गिरावट आयी थी।

24 अगस्त को बाजार के खुलने के साथ ही एप्पल के स्टाॅक में 13 प्रतिशत की गिरावट आयी। उसके सीईओ ने सीएनबीसी टेलीविजन पर जा कर एप्पल के निवेशकों को आश्वस्त किया कि कम्पनी के व्यापार को चीन में कोई खतरा नहीं है। दिन के अंत में एप्पल को 2.47 प्रतिशत की हानि हुई।

आॅनलाइन ब्रोकरऐज फर्मस टी.डी. अमेरिट्रेड और स्काॅटट्रेड में शेयर बेचने के आदेशों की बाढ़ सी आ गयी। उन्होंने कई निवेशकों को उनके एकाउण्ट तक पहुंचने में रोक लगा दी। स्काॅटट्रेड ने कहा कि ‘‘उसने शेयर बाजार के खुलते ही खरीदी-बिक्री में 230 प्रतिशत की तेजी को महसूस किया।’’

‘The VIX’- जो बाजार के आंकड़ों पर नजर रखता है, जिसे ‘फीयर इण्डेक्स’ के नाम से भी जाना जाता है, 53 पर पहुंच गया। पिछली बार मार्च 2009 में यह 50 से ऊपर था, जबकि बाजार 15 सितम्बर 2008 के ‘वाॅलस्ट्रीट आपदा’ के बाद अपने निचले स्तर पर पहुंच गया था।

भय का यह वातावरण इस बात को प्रतिबिम्बित कर रहा था कि बड़ी संख्या में लोग स्टाॅक की जगह अमेरिकी सरकार के बाॅण्ड्स की तरफ बढ़ रहे थे। ‘यूएस टेन इयर ट्रेजरी नोट्स’ की मांग काफी बढ़ गयी, लोगों ने इसे सुरक्षित ठिकाना मान लिया। कई महीनों बाद ऐसी स्थितियां बनी।

24 अगस्त को गिरावट के बाद ही अमेरिका में बाजार के संभलने की जैसी स्थितियां बनी, उसे देखते हुए यह अनुमान लगाया जा रहा है, कि बाजार में आई भारी गिरावट को रोकने के लिये फेडरल रिजर्व बोर्ड और उससे जुड़ी सरकारी एजेन्सियों ने परदे के पीछे से हस्तक्षेप करते हुए, बड़े पैमाने पर खरीददारी की व्यवस्था की है।

बाद में यह रिपोर्ट आई कि न्यूयाॅर्क स्टाॅक एक्सचेंज ने गिरावट के भयपूर्ण वातावरण में खरीदी-बिक्री से बचने के लिये एक गोपनिय और विशेष परिस्थितियों में उपयोग में आने वाले नियमों का उपयोग किया। नियम-48 के तहत ‘ट्रेडिंग के शुरू होने के तत्काल बाद ‘स्टाॅक प्राइस‘ को घोषित करने की अनिवार्यता को स्थगित कर दिया जाता है।‘ माना यही जा रहा है, कि इस नियम का उपयोग फेडरल रिजर्व के हस्तक्षेप को आसान बनाने के लिये किया गया हो सकता है।

2008-09 के संकट के बाद से स्टाॅक मूल्य को तीन गुणा करने के लिये फेडरल रिजर्व ने ब्याज दर को लगभग शून्य प्रतिशत रख कर और वित्त बाजार में कई ट्रिलियन डाॅलर डाल कर फाइनेन्स करने का काम किया था। जिसका लाभ आर्थिक रूप से मजबूत अभिजात्य वर्ग को मिला। इसलिये एक बार फिर वह अभिजात्य वर्ग को बचाने के लिये ऐसा करता है, तो इसमें असामान्य जैसी कोई बात नहीं है।

सात साल पहले पैदा हुए वित्तीय संकट के समय से ही फेडरल रिजर्व और अन्य प्रमुख सेण्ट्रल बैंकों और अमेरिकी सरकार की नीतियों का केन्द्र इस बात पर रहा है, कि कामगर-श्रमिक वर्ग की सम्पत्ति को काॅरपोरेट-वित्तीय अभिजात्य वर्ग में फिर से बांट दिया जाये, और ऐसा कटौतियों और स्टाॅक प्राइस को उच्च बिंदू पर रख कर दोनों के सहयोग के जरिये किया गया था।

यह अनोखा ‘बुल मार्केट‘ -शेयर बाजार- ही है, जो दुनिया के मिलियनेयरों और बिलियनेयरों को और अमीर करने के मुख्य तंत्र के रूप में काम कर रही है, वह भी तब, जबकि अर्थव्यवस्था अलाभकारी पूंजी निवेश और गतिहीनता में फंसी हुई है।

वर्तमान में, अमेरिकी फेडरल रिजर्व और उससे जुड़ी सरकारी एजेंसियों के द्वारा उठाया गया कदम किसी भी कीमत पर स्टाॅक मार्केट को बचाने की ऐसी कोशिश है, जिसका मकसद उस बबल को फटने से रोकना है, जो अपस्फिति की वजह से पैदा हो गया है। अंततः जिसका लाभ अमीर और सबसे अमीर लोगों को मिलना है। वास्तव में यह मुक्त व्यापार और बाजारवादी वैश्विक अर्थव्यवस्था का ऐसा संकट है, जिससे बचा नहीं जा सकता। यह स्टाॅक मार्केट में फैलते भय से शेयर की खरीदी-बिक्री की तेजी तथा भारी गिरावट और विश्व अर्थव्यवस्था पर अपस्फिति के दबाव को प्रदर्शित करता है।

चीन में आयी इस मंदी की वजह उत्पादन, निर्यात और निवेश में आयी गिरावट है। जिसकी वजह से चीन की अर्थव्यवस्था बुरी तरह प्रभावित हुई है। 2008 के वैश्विक मंदी के बाद से चीन ‘ग्लोबल इकोनाॅमिक ग्रोथ’ को गति देने वाले देशों में प्रमुख था। उसने ही वैश्विक मंदी की जड़ता और गतिहीनता को तोड़ कर दुनिया भर की जरूरतों को पूरा करने का काम किया। उसने अपने आर्थिक विकास को आधारभूत ढ़ांचे में बदलने, रियल स्टेट और अपने स्टाॅक मार्केट को विस्तार देने के लिये किया।

औद्योगिक उत्पादन और निर्यात के लिये विश्व बाजार और बाजार के लिये देश के आधारभूत ढ़ांचे का निर्माण और स्टाॅक मार्केट को विस्तार देने की नीति, बाजार के लिये देश को बाजार बनाने की ऐसी अनिवार्यता है जिससे बचा नहीं जा सकता, पूंजीवादी वैश्विक अर्थव्यवस्था की यह स्वाभाविक दिशा है, जिसके साथ जन असंतोष, समाज के बहुसंख्यक वर्ग का शोषण और वित्तीय संकट हमेशा से जुड़ा रहता है। इस व्यवस्था ने वैश्विक मंदी और आर्थिक अनिश्चयता को जन्म दिया है।

कई आर्थिक विश्लेषकों का मानना है, कि चीन के स्टाॅक मार्केट में आयी गिरावट के बाद सरकार के द्वारा, बाजार को संभालने के लिये जरूरी हस्तक्षेप और सख्त कार्यवाही न करना, बड़ी वजह है। जिसकी वजह से स्टाॅक मार्केट में भय का वातावरण बना।

चीन की सरकार ने चीनी पेंशन फण्ड को स्टाॅक मार्केट में लगाने की अनुमति (स्वीकृति) दे दी है। जो लगभग 550 बिलियन डाॅलर है। लेकिन इससे स्टाॅक मार्केट की गिरावट को संभालने में खास मदद नहीं मिली।

शेनजिन में लांगटेन ऐसेट मैनेजमेंट के प्रेसिडेन्ट वू जियानफेंग ने कहा- ‘‘पेंशन फण्ड की स्वीकृति ने काम नहीं किया, जो इस बात का प्रमाण है, कि निवेशकों का विश्वास स्टाॅक मार्केट से उठ गया है।‘‘ जहां पिछले एक सप्ताह से लगातार गिरावट जारी है, और जहां भय का वातावरण है।

चीन और विश्व अर्थव्यवस्था में जड़ता के साथ गिरावट और अमेरिकी डाॅलर में हुई बढोत्तरी ने दुनिया की तथा कथित विकासशील उभरती हुई बाजार व्यवस्था को कमजोर करने का काम किया है। ब्राजिल, मैक्सिको, तुर्की रूस, इण्डोनेसिया और दक्षिण अफ्रीका जैसे देशों की अर्थव्यवस्था कमजोर हुई है। इन देशों की निर्भरता वस्तु निर्यात की दृष्टि से चीन पर रही है। चीन की गिरावट ने इन देशों के वित्त बाजार और मुद्रा में गिरावट आ गयी है। एक साथ दुनिया के कई देशों में हो रही गिरावट का सीधा अर्थ है, कि विश्व अर्थव्यवस्था मंदी और नये वित्तीय संकट से तेजी से घिरती जा रही है।

दुनिया के निर्णायक अर्थव्यवस्था में आयी जड़ता एवं गिरावट के साथ वस्तुओं के मूल्य में भी भारी गिरावट आ गयी है। 24 अगस्त काो अमेरिकी तेल की कीमत में 5 प्रतिशत की गिरावट आयी और वह पिछले 6 साल के न्यूनतम स्तर पर पहुंच गया। ब्रेंट क्रूड आॅयल का मूल्य 45 डाॅलर प्रति बैरल से भी नीचे पहुंच गया, जो कि 2009 के बाद से अब तक की सबसे बड़ी गिरावट है।

चीन ने अपने औद्योगिक एवं निर्यात के खराब आंकड़ों को देखते हुए अपनी मुद्रा युआन का अवमूल्यन कर दिया, परिणाम स्वरूप दुनिया भर के स्टाॅक मूल्यों में आयी कमी की वजह से दुनिया भर के स्टाॅक मार्केट को कई ट्रिलियन डाॅलर का भारी नुक्सान हुआ।

‘पिपुल्स बैंक आॅफ चाइना‘ ने नवम्बर 2014 से अब तक पांच बार अपने ब्याज दर को कम किया है। उसके इन कदमों से 25 अगस्त को यूरोपीय और अमेरिकी स्टाॅक ने उच्च स्तर पर व्यापार किये। चीन ने एक साल के कर्ज दर को घटा कर 4.6 प्रतिशत कर दिया, जो कि उसके के लिये अब तक का सबसे कम दर है।

चीन से आये सकारात्मक खबरों की वजह से वाॅलस्ट्रीट उच्च अंकों के साथ खुला डाउ जोन्स इण्डस्ट्रियल और एस एण्ड पी 500 2 प्रतिशत बढ़ा, जबकि नास्डैक 3 प्रतिशत बढ़े हुए अंकों के साथ खुला। तेल के कीमत में भी वापसी हुई। ब्रेट क्रूड आॅयल में भी 2 प्रतिशत की वृद्धि हुई।

चीन के सेण्ट्रल बैंक के द्वारा कर घटाने का निर्णय पिछले 4 दिनों से शंघाई कम्पोजिट इंडैक्स में आयी भारी गिरावट की वजह से लिया गया। 19 अगस्त से 25 अगस्त के बीच चीन के स्टाॅक बाजार को 22 प्रतिशत की हानि हुई।

‘वन ईयर डिपाॅजिट रेट‘ में 25 मूलभूत बिंदुओं की कटौती करके उसे 1.75 प्रतिशत कर दिया गया। ये सभी बदलाव 26 अगस्त से प्रभावी हो गये।

शंघाई कम्पोजिट इंडैक्स में 25 अगस्त को भी 7.63 प्रतिशत की गिरावट आयी।

निवेशक इस बात से परेशान और उद्वेलित हैं, कि ‘चाइना सिक्यूरीटीज़ रेग्यूलेटरी कमीशन‘ इस संकट के बाद भी बाजार को संभालने के लिये किसी भी तरह का आपात कदम नहीं उठा रहा है। जबकि पहले चीन का सेंट्रल बैंक बाजार को संभालने के लिये हंस्तक्षेप करता था। पिपुल्स बैंक आॅफ चाइना ने जुलाई से अब तक चीनी स्टाॅक की खरीदी पर 200 बिलियन डाॅलर से ज्यादा खर्च किया है। अगस्त में उसने उसी दिन स्टाॅक की खरीदी-बिक्री करने पर रोक लगा दी। इससे लड़खड़ाते बाजार के उतार चढ़ाव से मुनाफा कमाना मुश्किल हो गया।

चीन की सरकार के द्वारा संचालित चाइना सिक्यूरिटी रेग्यूलेटरी कमीशन ने जुलाई में घोषणा किया कि ‘‘कोई भी शेयर होल्डर, जिसके पास किसी भी शंघाई या शेंजेन में सूचि बद्ध कम्पनियों के 5 प्रतिशत से ज्यादा शेयर हैं, उसे अगले 6 महीनों तक उसे कम नहीं करना चाहिये। इसमें विदेशी निवेशक भी शामिल हैं।‘‘ शेयर होल्डरों के शेयर को बेचने के अधिकार को स्थगित कर दिया गया।

बाजारवादी कुछ विश्लेषकों का अनुमान है, कि ‘‘मौजूदा संकट से चीन की वैश्विक दावेदारी, वैकल्पिक मुद्रा एवं वैश्विक व्यवस्था को गहरा आघात लगा है।‘‘ भारत के वित्त मंत्री अरूण जेटली और भाजपा के चिंतक कहे जाने वाले सुब्रहमण्यम स्वामी ने तो चीन की खाली जगह को भरने (जोकि खाली नहीं है) और मौके का फायदा उठाने की बातें भी कर दी हैं। उन्हे वैश्विक वित्तीय संकट शायद खेल सा लग रहा है। उनकी जल्दबाजी और दावेदारी के साथ हम उन्हें यहीं छोड़ते हैं, और यह मान कर चलते हैं, कि वित्तीय संकट इस वैश्विक बाजार का संकट है, जिसके दांव-पेंच गहरे हैं।

चीन के पास दुनिया का (अघोषित) सबसे ज्यादा स्वर्ण भण्डार (गोल्ड रिजर्व) है। उसने अपने रिजर्व को अभी छुआ तक नहीं है, ना ही वह पूरी तरह निजी कम्पनियों और काॅरपोरेशनों की गिरफ्त में है। उसमें अपने स्टाॅक मार्केट को बचाने की हड़बड़ी भी नजर नहीं आ रही है। क्यों?

चीन क्या चाहता है और वैश्विक मंदी को संभालने या उसे बढ़ाने की योजना क्या है? सही निष्कर्ष तक पहुंचने के लिये इन सवालों से टकराने के अलावा और कोई रास्ता नहीं है।

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