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डाॅ. आभा गुप्ता का रंग-कर्म और आषाढ़ का एक दिन

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‘‘जो व्यक्ति हंसता नहीं, न समाज से सम्पर्क रखता है, वह भयंकर व्यक्ति है, वह चुपचाप अन्दर ही अन्दर नाना-प्रकार के विचारों में निमग्न रहता है, यह सम्भव है कि वह दुर्भावनापूर्ण कल्पनाओं का शिकार हो, दूसरों को हानि पहुंचा दे।’’

यह कथन शेक्सपियर के नाटक ‘जूलियस सीजर’ का है। मानव-मनोव्यवहार और समाज-समूह सापेक्षिक अंतःक्रिया की दृष्टि से यह बात आज की तारीख में भी उतनी ही महत्त्वपूर्ण और अकाट्य मालूम देती हैं, जैसे यह कसौटी स्वयं शेक्सपियर ने अपने लिए निधार्रित कर रखी हो। किसी भी ज़हीन कला को अपने लिए उपभोक्ता नहीं, भावक चाहिए होता है। सहृदय मनुष्य। नाटक जैसे रंगमंचीय विधा में जहां कलाकारों को सशरीर प्रस्तुति देनी होती है; वहीं उन्हें अपने अभिनय में पात्रानुकूल मनःस्थिति, भाव-मुद्रा, देहयष्टि, प्रेम, प्रसन्नता, आश्चर्य, उत्तेजना, संवेदना, स्थूल-सूक्ष्म मनोभाव, नेत्र-संचलान, अश्रु, दृष्टि, स्पष्ट उच्चारणशीलता, शाब्दिक आरोह-अहरोह, लहजा, अनुतान, यति, गति, थिरकन, खनक आदि को भी अपनी पेशगी में उपयुक्त स्थन यानी तरजीह देना होता है। प्रस्तुति प्रभावित करे। मंचित नाटक दिल में गहरे तक उतरे। इसके लिए आवश्यक है कि देश, काल और वातावरण के बीच पर्याप्त संतुलन-संगति बरती जाए। मंचीय साज-सज्जा, रंग-संयोजन, प्रकाश-व्यवस्था, ध्वनि-विशेष आदि मंचीय-नाटक के आवश्यक तत्त्व हैं जिनके लिए सामान्य-सी बात यह है कि इनका होना अपरिहार्य है। लेकिन रंगमंच की यह साधारण-सी दिखने वाली सहज-स्वाभाविक मांग शौकिया नाटक की जीद-धुन-जुनून रखने वालों के लिए अप्रत्याशित ढंग से विकट चुनौती बनकर खड़ी हो जाती हैं।

काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग की सह-प्राध्यापिका डाॅ. आभा गुप्ता ठाकुर इन चुनौतियों से मोर्चा लेने के लिए ख्यात हैं। उनके लिए नाटक करना एक ‘पैशन’ है। उनमें संवेगों का गुरुतर आवेग है, जो रति-राई चीजों अर्थात् साधारण-सी लगने वाली वस्तुओं को भी दृश्य में साकार करने के लिए अथक परिश्रम करती दिखाई देती है। दरअसल, उनकी दृष्टि अपने मंचित किए जा रहे नाटक में आलोचना का ताप, तेज और अधिकाधिक प्रतिक्रिया पैदा करने का समर्थक है। वह नाटक के लिए किए जा रहे पूर्वाभ्यास में क्षण दर क्षण अपनी कायिक-मानसिक स्थिति बदलती हैं। डाॅ. आभा की यह भागदौड़ इसलिए सार्थक और उपयुक्त है; क्योंकि वह ‘रिहर्सल’ में स्वयं को दर्शक की भूमिका में रखकर देखती हैं। दरअसल, वह रंगमंच और अभिनय का शब्दार्थ जानती हैं। उनका स्पष्ट मानना है कि नाटक अंततः दर्शकों के लिए है। अतः वह एकांत में भी चुप नहीं रहती है। बंद ज़बान में भी उनका मौन बजता है। शायद! इसीलिए वह तमाम दुश्वारियों के बीच अपना सौ-फीसदी देने के लिए अंत तक प्रयासरत रहती हैं।

एक नाटक की प्रस्तुति के बाद दूसरे नाटक के मंचन में डाॅ. आभा समय लेती हैं, अंतराल बरतती हैं। वैसे समय में जब सबकुछ पाने की लिप्सा, होड़ और आपाधापी अत्यंत विकट है; वह लम्बे ‘ब्रेक’ के बाद दुबारा कोई कार्य ठानती हैं। इस बाबत पूछने पर वह फसल-चक्र का उदाहरण देती हैं। यह उनकी सोच की परिपक्वता और वैज्ञानिकता की मिसाल है जो शाब्दिक कहकहे अथवा मंचीय भाषणों से अलहदा समूह में सार्थक संवाद, सामूहिक अभिव्यक्ति, सर्जनात्मक प्रतिपाद्य का उत्कृष्ट उदाहरण सामने रखती है।

अब तक दर्जर्नों प्रस्तुति दे चुकी डाॅ. आभा गुप्ता से बात करते हुए इस सचाई का ब्यौरा अपने आप मिल जाता है कि उनके लिए नाटक-प्रस्तुति जुनून की हद तक कला से उनकी अंतरंगता, कल्पना-स्वप्न, विचार और अभिव्यक्ति का पालना तो है ही; इसके अतिरिक्त उन्हें अपने समूह के सर्वजन के साथ समानुभूतिक अंतःपाठ भी है। वे खुले तौर पर स्वीकार करती हैं कि नाटक प्रयोग-विज्ञान है। इसके बारे में बात नहीं हो सकती। इसे अंततः दृश्य में रूपाकार करना होता है; शब्दों के माध्यम से जिह्वा पर धुनी रमानी होती है; कानों में ध्वनियों के मूसलाधार बारिश के साथ भींगना होता है और उनके भेद और बारीकियों को बड़ी सूक्ष्मता से समझना और अलगाना भी।

इसी वर्ष फरवरी माह की 19 तारीख को उन्होंने मोहन राकेश के लिखे नाटक ‘आषाढ़ का एक दिन’ का मंचन किया। यह प्रस्तुति काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के शताब्दी वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में आयोजित था। बतौर निर्देशिका यह उनकी चैथी प्रस्तुति(औरत, आधे-अधूरे, अंधा-युग) है। प्रायः उनके नाटकों की स्त्री लाख विडम्बनाओं को झेलकर भी यूनानी मिथक सिसिफस की तरह ऊध्र्वारोही अभ्यास में निमग्न दिखाई देती है। डाॅ. आभा गुप्ता ठाकुर के साथ सीधी बातचीत करते हुए उनके भीतर रचे-बसे प्रतिरोध(सिर्फ स्त्री-प्रतिरोध नहीं मानवीय प्रतिरोध) को बिना किसी थर्मामीटर अथवा यांत्रिक उपकरण के नोटिस लिया जा सकता है। वह बड़ी साफगोई से बेलाग-बेलौस कहती हैं-‘‘पुरुष को सिर्फ स्त्रियां चाहिए, जो उनके अहं को तुष्ट करे। वे विवेकशील-तर्कसम्पन्न जहीन और समझदार औरतों को बर्दाश्त नहीं कर सकते हैं।‘‘ उनके कहे का अर्थ और यथार्थ उनके द्वारा निर्देशित-मंचित नाटक ‘आषाढ़ का एक दिन’ देखते हुए शिद्दत से महसूस की जा सकती है। अपने रंग-विन्यास और प्रस्तुति में यह नाटक कुछ कमियों अथवा अधूरापन खटकने के बावजूद दर्षकों के लिए सुखद अहसास का साक्षी अवश्य बना।

ख्यातनाम साहित्यकार मोहन राकेश का लिखा  ‘आषाढ़ का एक दिन’ एक युगीन नाटक है। शुंग-वंश कालीन देश-काल-परिवेश को खुद में समोये इस नाटक में मुख्य पात्र की भूमिका में महाकवि कालिदास हैं। यह नाटक योग्यतम व्यक्ति में सम्मान और प्रतिष्ठा पाने की मोहासक्ति और अतिरिक्त आकांक्षा को अभिव्यक्ति देता है, तो अपने ग्राम-प्रांतर से अलग न होने का प्रण जताते हुए भी दिखाता है। दोनों एक समय में एक साथ नहीं रह सकते हैं। विरोध बरकरार रखते हुए मैत्री असंभव है। वस्तुतः यह मनुष्य की इच्छा पर समय का मारक प्रहार है जिसका शिकार होती है-ग्राम-प्रांतर की मल्लिका। ग्रामीण युवती मल्लिका कालिदास के प्रेम से सुवासित है।  उसके भीतर कालिदास के प्रति खिंचाव, लगाव और आकर्षण दैहिक-सत्ता और सौन्दर्य के अत्याधुनिक समीकरण से सर्वथा भिन्न दिखाई देते हैं। वह कोमल भावनाओं, संवेगों, अभिलाषाओं, आह्लादों आदि से इस कदर रींजी-भिंजी हुई है कि उसे आषाढ़ की पहली बारिश में पूरी तरह भींग जाना भी प्रमुदित कर देता है। ग्राम-प्रांतर की मल्लिका अपनी मां अंबिका से जब वार्तालाप कर रही होती है, तो उसके चेहरे का उल्लास और ठाठ देखते बनता है। स्त्रियाँ प्रायः अपनी निश्छलता की वजह से ही छल का  शिकार होती हैं। यहां कालिदास उज्जैयिनी से आए बुलावे के लिए तैयार न थे; लेकिन यह नकार क्षणिक और सिर्फ बाह्य दिखाई देता है। जबकि मल्लिका सोलह आने कालीदास के प्रेम में भीनी-पगी हुई है। तिस पर भी वह कालिदास की कामना को सत्य और साकार होते देखना चाहती है। उसकी शुभेच्छा और मंगलकामना कालिदास के सम्मान और प्रशस्ति में होने वाले अभिवृद्धि को न्योछावर है। वह जितनी अंदर से व्याकुल है, बाहर से उतनी ही शांत और शालीन बने रहने के लिए चेष्टारत। जबकि कालिदास इस अंतद्र्वंद्व से यथाशीघ्र निकलने को अधीर मालूम पड़ते हैं।

यह नाटक वास्तव में आज के मध्यवर्गीय समाज के मौकापरस्त और अवसरवादी होते जाने का प्रतीकात्मक आख्यान है जिसमें एक सर्जनात्मक पुरुष अपनी महत्त्वाकांक्षा की षष्ठीपूर्ति में हर तरह के मौके भुना-भंजा लेने का आदी है। स्वयं नाटक-निर्देशिका का कहना है-‘‘नाटक में कालिदास व्यक्ति न होकर सृजनात्मक शक्तियों का प्रतीक है। नाटक में एक ओर मध्यवर्गीय अवसरवादिता को अनावृत किया गया है, तो दूसरी ओर आर्थिक विपन्नता के व्यक्ति पर पड़ने वाले प्रभाव जैसे मुद्दों पर भी आनुषंगिक रूप से विचार किया गया है। साथ ही सता की क्रूरता एवं विसंगति तथा शासक वर्ग की जड़ मानसिकता को भी उभारा गया है जो दंतुल, अनुस्वार, आनुनासिक आदि पात्रों द्वारा व्यक्त होती है।

इस नाटक में अंबिका सुस्थिर चित्त वाली एक दृढ़ स्त्री है। वह मल्लिका की माँ है। उसके अनुभव में बेचैन कर देने वाली तीखापन है जो दर्षकों को बराबर वेधती है। उसकी बातों में ही नहीं; बल्कि अंबिका के दैहिक बर्ताव, भाव-मुद्रा, प्रतिक्रिया, विरोध, संलाप और अंततः आत्मप्रलाप की अंतिम स्थिति में भी वह मल्लिका को सही नहीं ठहराती है। मल्लिका का यह कथन कि ‘उसने भावना में भावना का वरण किया है।’ उसे आखिरी तक बहुत कचोटता है। अपनी जीर्ण-शीर्ण काया में भी वह मल्लिका को सच को दुलराने की जगह उसे उसके नंगे और क्रूरतम रूप में स्वीकारने के लिए अपनी नज़र देती है। वह कहती है-‘एक पुरुष के लिए यह सब, इतना कुछ’। दरअसल, वह पुरुषोचित स्वभाव के रग-रग से वाकिफ है। वह जानती है कि कालिदास के लिए मल्लिका को अपनी प्रेम-रागिनी के रूप में स्वीकारना संभव नहीं है। वह हरमुमकिन स्थिति में अपनी इच्छा पर महत्तवाकांक्षा को प्रश्रय देगा। समयानुकूल निर्णय लेगा; क्योंकि उसकी दृष्टि में प्रेम, परिवार, पर्वत, पहाड़, ग्राम-प्रांतर सब उसे अभाव और भत्र्सना का भागी बनाते हैं जिसका परिहार वह मल्लिका को अपनी आश्रयस्थली बनाकर करता है। नाटक का एक पात्र विलोम इस बात को पहले ही धीरा(चेतावनी) चुका होता है। बाद में अंबिका और विलोम सही साबित होते हैं। सम्मान और प्रतिष्ठा के लिए उज्जैयिनी गए कालिदास फिर अपने ग्राम-प्रांतर नहीं लौटते हैं। उनकी विरहिणी प्रेमिका मल्लिका अपनी मां के लाख समुझाहट के बावजूद कालिदास के प्रति कोई अन्य भाव नहीं रखना चाहती है। एक स्थिति वह भी आती है जब कालिदास ग्राम-प्रांतर आकर भी मल्लिका से नहीं मिलते हैं। हाँ, उनकी विवाहिता प्रियंगुमंजरी मल्लिका से अवष्य मिलती  आती है। वह उसे नाना-प्रकार के प्रलोभन देती है। मल्लिका बड़ी सहजता से इन प्रस्तावों को स्वीकारने से इंकार कर देती है। वह उलाहना और प्रतिशोध में गलतबयानी नहीं करती है। मल्लिका के चरित्र की यह उदात्तता ही उसे प्रश्नांकित करती है। यह सवाल उठाती है कि एक आत्मलोभी पुरुष के लिए इस उत्कट बलिदान का आखिर क्या मतलब? राजसी अहमन्यता के खिलाफ उसका प्रतिरोध काफी ‘लाउड’ है, जबकि ध्वनि के डेसीबल में इसकी मात्रात्मक अभिव्यक्ति बहुत नपी-तुली हुई। मल्लिका आज के उस स्त्री का अक़्स उभारती है, जो अपने परम-प्रिय पुरुष का इतिहास-भूगोल जानते हुए भी अनजान बने रहना चाहती है। वह अपने भरोसे को सच मनवाने के लिए वैकल्पिक तर्क गढ़ती है-‘‘व्यक्ति जब उन्नति करता है, तो उसके नाम के साथ कई तरह के अपवाद भी जुड़ जाते हैं।’’ यहाँ यह प्रश्न दिलोंदिमाग को मथता है कि क्या स्त्रियों की उन्नति, प्रगति और समृद्धि के कारण उत्पन्न ऐसी किसी भी अपवाद को क्या स्वयं पुरुष अपवाद मात्र मानता है? विचारणीय है।

इस नाटक में विलोम और मातुल की भूमिका उल्लेखनीय है। दोनों नाटक की कथानक और मनोभूमि से गहरे संस्तर तक जुड़े हैं। इन दोनों की उपस्थिति से नाटक की नाटकीयता जीवंत यानी प्राणवान हो उठती है। दोनों द्वंद्व और अंतर्विरोध को सहज उद्वेलित-उत्तेजित करते हैं। उनकी उपस्थिति इस बात की भी संकेतक है कि आजकल मध्यवर्गीय समाज में एक ज़मात ऐसी भी है जो दूसरों के जीवन-प्रसंग में अनाधिकार प्रवेश करते हैं। हरसंभव उनके जीवन में एक अयाचित स्थिति उत्पन्न करते हैं। ऐसे लोग दूसरों की तकलीफों की बिनाह पर अपना हित साधते हैं। इसी तरह नाटक की गति-यति और आरोह-अवरोह को रानी प्रियंगुमंजरी की अनुचरियों और उनके राज-अधिकारियों अनुस्वार और अनुनासिक की भूमिका दर्शकों को अपने समय का सहचर बना देती हैं। आज की नौकरशाही व्यवस्था में सरकारी निजाम किस तरह कार्य लेता है और कैसे-कैसे लोगों को नियुक्त कर स्वयं अपनी जवाबदेहियो से बरी हो लेता है; इसका प्रमाण है-अनुस्वार और अनुनासिक की नाटक में महत्वपूर्ण उपस्थिति। इसी तरह आज का सत्ता-समाज देहलोलुप और सौन्दर्य-पिपासु किस तरह बन गया है, इसका अनुमान कालिदास की पत्नी प्रियंगुमंजरी की अनुचरियो को देखकर सहज हो जाता है।

मध्यवर्गीय समाज की त्रासपूर्ण जिदगी, विडम्बना-अन्तर्विरोध, त्याग-समर्पण, लोभ-आकांक्षा, अभाव-दुरूहता, आंचलिकता-नागरीपन, सत्ता-प्रभुता, भाट-चारणपन आदि की इस नाट्य-प्रस्तुति में तरतीब दृष्यांकन है। वास्तव में कालिदास स्वाधीनता के बाद का मनुष्य है। वह चाहता है कि उसकी प्रतिभा विज्ञापित हो। मध्यवर्गीय समाज से उसका रिश्ता गहरा और सघन है; किन्तु उसकी प्रबल महत्वकांक्षा न चाहते हुए भी उसे सत्ता-तंतुओं के साथ राग-दरबारी होने पर बाध्य-विवश कर देती है जिसका कि अपने समूह, लोक से विस्थापन तो दिखता ही है। उसका प्रेम भी निर्वासित होता है। इस नाटक की एक बड़ी ताकत लोक की स्त्री का वह चेहरा है जो अपने स्वभाव-व्यवहार में बेहद विनम्र, भावुक, संवेदनशील है’ किंतु उसका प्रतिरोध व्यापक और बहुआयामी है। विक्षिप्त मनोदशा को प्राप्त कर चुके कालिदास के लिए मल्लिका अब भी एक सम्मोहन है। जबकि मल्लिका अपने वर्तमान में खुद की निजता अर्थात् वैयक्तिक सता का लोप कर चुकी होती है। कालिदास के लिए यह लगभग अविश्वसनीय-सा लगने वाला सत्य है कि मल्लिका विलोम की विवाहिता है। मल्लिका स्पष्ट और साफ सुनाई देने वाले शब्दों में कहती है-‘‘ये मेरे अभाव के संतान हैं, और यही मेरे वर्तमान हैं।’’ सजल नेत्रों से अंत तक कालिदास को निःस्वार्थ प्रेम करने वाली मल्लिका की यह निर्भीक स्वीकारोक्ति उसके दृढ़ चेतना का परिचायक है। समय के इस फेरफार से साक्षात्कार कर कालिदास चकित, स्तब्ध और मूक रह जाता है; ऊपर से मल्लिका की बदली हुई आत्मगौरवा व आत्मस्वाभिमानी छवि कालिदास को बेचैन ही नहीं; अपितु अंतःप्रताडि़त करती है। उसे यह भान हो जाता है कि उसके अन्दर समय और इच्छा का द्वंद्व था। आवेश और उद्रेक की मिलीभगत थी। समय ने आखिरकार उसे चित कर डाला है और उसमें इतनी सामथ्र्य नहीं है कि वह मल्लिका को इस नए रूप में स्वीकार कर सके। वह जान गया था कि समय किसी की प्रतीक्षा नहीं करता है।

इस तरह नाटक अपनी समाप्ति के साथ दर्शकों को सिर्फ भाव-विभोर नहीं करता है; बल्कि उन्हें अपने समय की विडम्बनाओं, चुनौतियों, संत्रास, दुव्र्यवस्था, स्त्री-अंतर्जगत की विशालता और उसकी अतुलनीय निष्कपटता के बीच सीधे तनकर खड़े होने की अकूत क्षमता का भी परिचय देता है। ग्रामीण पहिरावे और जीवनशैली से लता की तरह लिपटी मल्लिका का चरित्र अंत में जितना मुखर और प्रतिरोधी दिखाई देता है। वह वास्तव में इस नाट्य-मंचन की निर्देषिका डाॅ. आभा गुप्ता ठाकुर के भीतर के रचनात्मक कैनवास और उसकी बुनावट में संचित प्रतिरोधी वितान का फलाफल है। कहना न होगा कि मल्लिका बिना शस्त्र उठाए और शास्त्रार्थ किए पुरुष अहमन्यतावादी केंचुल को बड़ी सहजता से उतार फेंकती है। यह नाटक अपनी इस केन्द्रीय अभिव्यक्ति के द्वारा कितना जीवंत, महत्त्वपूर्ण और सार्थक बन पाया है यह तो दर्शकों का मानस ही बताएगा; लेकिन सच्चे अर्थों में रंगमंडल के सभी कलाकारों और सहयोगी सदस्यों ने दर्शकों के साथ पूर्ण न्याय करने की अपनी निष्ठा और संलग्नता को बड़ी सुघड़ता से निभाया है। नाटक में दर्शक इसलिए भी अधिक महत्वपूर्ण होता है कि वह सहभागी है और अपनी उपस्थिति में सहभोक्ता भी।

सहज, सरल, मृदुभाषी और सबको बराबर की तमीज से आदर देने वाली डाॅ. आभा गुप्ता ठाकुर यह स्वीकार करती हैं कि उन्होंने ब. व. कारंत, सफदर हाशमी जैसे मंझे नाटककारों के साथ काम किया है; उनके साथ रहकर रंगमंचीय अनुभव प्राप्त किया है। डाॅ. आभा एक आवाज़ पर सहज उपलब्ध होने को आतुर दिखती हैं या अपने नाटक का मंचन देखने आने के लिए आग्रह-मनुहार कर रही होती हैं, तो उनका बड़प्पन साफ झलक जाता है। वह हर किसी से कुछ न कुछ सीखने, जानने और दूसरों को समझने की अपनी निगाह में भरपूर चेष्टा करती हैं। ‘आषाढ़ का एक दिन’ नाटक देखते हुए दर्षक मंचीय-प्रस्तृति में उनके व्यवहार, व्यक्तित्व, सहभागिता, सामूहिकता, निर्णय-नेतृत्व आदि का प्रतिबिम्बन साफ दिखाई पड़ता है। कैसे एक निर्देशक अपनी सर्जनात्मक-कर्म में अनवरत लट, बेसुध और निरंतर युद्धरत रहता है; यह नाट्य-मंचन के परस्पर वाद-विवाद-संवाद का केन्द्रीय विषय बन जाता है, जिसके लिए वह अगले दिन एक तारीख तक मुकर्रर कर देती हैं। डाॅ. आभा की यह एक बड़ी खासियत है कि वह आलोचनाएँ आमंत्रित करती हैं।

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पूर्व मंचित नाटक: ‘अपहरण भाईचारा का’; ‘औरत’; ‘हल्ला बोल’; ‘मिल के चलो’; ‘दीपदान’; ‘लहू का रंग एक है’; ‘रीढ़ की हड्डी’; ‘चित्रांगदा’; ‘आधे अधूरे’; ‘अंधा युग’;  अन्धेर नगरी; टेम्पेस्ट; कस्तुरी कुण्डल बसै(नृत्य नाटिका) एवं अन्य। 8-10 फुल लेंथ की नाटक मंचित
दूरदर्शन के लिए: ‘माटी सोंधी गाँव की’
इससे पूर्व काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में: ‘औरत’; ‘आधे अधूरे’; ‘अंधा युग’
संग रंगकर्मी: सफदर हाशमी, माला जी, ब. व. कारंत,

0940a37राजीव रंजन प्रसाद,

प्रयोजनमूलक हिन्दी, हिन्दी विभाग,

काशी हिन्दू विश्वविद्यालय,

वाराणसी-221 005;

मो. 7376491068;

rajeev5march@gmail.com

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